6-12 साल के बच्चों के लिए फेसबुक लाया चैटिंग ऐप

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क्या आप मान कर चल रहे हैं कि आपके बच्चे अगर घर में हैं तो सुरक्षित हैं और आपकी निगरानी में हैं?

हाल ही में ब्लू व्हेल चैलेंज ने जिस तरह बच्चों पर प्रभाव डाला, ये कहना मुनासिब नहीं कि बच्चे अब घर में भी सुरक्षित हैं. उनके साथ हर वक्त मौजूद हैं उनके स्मार्टफोन और इंटरनेट भी. अगर निगरानी की भी जाए तो कितनी जगह. इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, यूट्यूब, वॉट्सऐप और फेसबुक जैसे तमाम सोशल मीडिया के माध्यम बिखरे हुए हैं.

सोशल मीडिया ने तेज़ी से भारत में अपनी जगह बनाई और फेसबुक ने तो अब तक तकरीबन 20 करोड़ उपभोक्ता बना लिए हैं. फेसबुक अब आपके छोटे बच्चों को भी अपना उपभोक्ता बनाने की तैयारी कर चुका है. फेसबुक ने 6 से 12 साल के बच्चों के लिए एक नया चैटिंग ऐप लांच किया है - मैसेंजर किड्स.

इस चैटिंग ऐप की ख़ासियत है कि इस पर अभिभावकों का कंट्रोल रहेगा. बच्चे अपनी मर्ज़ी से ना किसी को जोड़ पाएंगे और ना कोई मैसेज डिलीट कर पाएंगे. सिर्फ अभिभावक ही ऐसा कर पाएंगे. फेसबुक का मानना है कि बच्चे किशोर और वयस्क लोगों के लिए बने मैसेज ऐप इस्तेमाल करते हैं जो बच्चों के लिए ठीक नहीं है.

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'बच्चों के लिए नया खतरा'

फिलहाल ये ऐप अभी अमरीका के बच्चों के लिए ही आया है, लेकिन अनुमान है कि धीरे-धीरे इसे बाकी देशों में भी उपलब्ध करवाया जाएगा. साइबर एक्सपर्ट रक्षित टंडन का मानना है कि ये बच्चों के लिए एक नया खतरा है.

रक्षित टंडन कहते हैं, "हम पहले भी देखते रहे हैं कि छोटे बच्चे फेसबुक पर गलत उम्र डाल कर प्रोफाइल बनाते हैं. अब आप 6-7 साल के बच्चे को चैटिंग की लत डालना चाहते हैं. इससे बच्चा असल ज़िंदगी में बातचीत करना कैसे सीखेगा, सामाजिक व्यवहार कैसे सीखेगा. वो क्यों मैसेंजर पर बात करे, वो पहले अपने माँ-बाप से बात करना सीखे."

गेमिंग और स्मार्टफ़ोन की लत के असर का ज़िक्र करते हुए रक्षित कहते हैं कि अभी एक केस देखा है जहाँ एक छोटा बच्चा गेम्स की वजह से इतना प्रभावित हो गया कि वर्चुअल चीज़ को सच मानने लगा है.

अभिवावकों की मजबूरी के सवाल पर रक्षित कहते हैं कि 'ये फेसबुक के लिए बिज़नेस है क्योंकि उनके नए यूजर्स तैयार हो रहे हैं. लेकिन अभिवावक ऐसा कहें कि वो चाहे ना चाहें, लेकिन बच्चा तो करेगा ही तो फिर पेरेंटिंग क्या हुई? अगर फेसबुक कोई कविता या कहानियों के लिए ऐप निकालता तो बेहतर होता, लेकिन एक चैट ऐप का कोई अच्छा उद्देश्य मुझे नज़र नहीं आता.

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अभिवावकों के लिए मददगार?

मनोविज्ञानी अनुजा कपूर इस पर अलग नज़रिया रखती हैं.

वो कहती हैं, "इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि अगर हम बच्चों को खुद ही ओपन प्लेटफॉर्म देते हैं तो कम से कम वो छुप कर कोई काम नहीं करेंगे. ये ऐसा ही है जैसे आप बच्चों को कोई फिल्म दिखा रहे हैं मां-बाप के मार्गदर्शन में. जब हम देखेंगे कि वो चैटिंग में क्या बात कर रहा है अपने दोस्तों से तो उससे हमें अंदाज़ा होगा कि उसकी मनोवृति क्या बन रही है."

साथ ही एक ज़रूरी सलाह भी देती हैं कि पहले मां-बाप इसके लिए खुद मानसिक तौर पर तैयार हों और उसके बाद ही बच्चों को इसका इस्तेमाल करने दें. ऐसा ना हो कि वो कोई गड़बड़ देखें और फिर बच्चे को सज़ा दें. ऐसे में फिर इस ऐप से पेरेंटिंग में मदद मिलने की गुंजाइश नहीं रहेगी.

3 साल के बेटे के पिता रोहित सकुनिया कहते हैं, "तकनीक इस तरह हमारी ज़िंदगी में घुस गई है कि मैं कोशिश भी करूं तो शायद अपने बेटे को रोक नहीं पाऊंगा. तो मैं चाहूंगा कि तकनीक ही मुझे इसका हल भी निकाल कर दे दे. अगर ऐसा ऐप है जिससे मैं ट्रैक कर सकूं कि बेटा किससे क्या शेयर कर रहा है तो ये अच्छा ही है.''

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'मेरे बच्चों से दूर रहो फेसबुक'

ब्रितानी राजनेता और स्वास्थ्य मंत्री जेरेमी हंट ने ट्वीटर पर तीखी प्रतिक्रिया दी.

उन्होंने लिखा है, "मैं विश्वास से नहीं कह सकता कि ये सही दिशा में जा रहा है. फेसबुक ने मुझे कहा था कि वो मेरे पास बच्चों को अपने प्रोडक्ट से दूर रखने के आइडिया लेकर आएगा, लेकिन वो तो छोटे बच्चों को ही टारगेट कर रहा है. मेरे बच्चों से दूर रहो फेसबुक और ज़िम्मेदारी से काम लो."

तकनीक ने बच्चों में नई तरह की लत को जन्म दिया है और अभिवावकों की ज़िम्मेदारी को थोड़ा और बढ़ा दिया है.

प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक 92% किशोर हर रोज़ इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और उनमें से 24% लगातार ऑनलाइन रहते हैं.

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि मोबाइल के आदी लोगों के एमआरआई और कैट स्कैन में किसी ड्रग के आदी लोगों जैसा ही पैटर्न होता है.

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डिप्रेशन के कगार पर

एक रिसर्च के मुताबिक जो बच्चे सोशल नेटवर्क पर जितना ज़्यादा वक्त बिताते हैं, वे बाकी वक्त कम खुश होते हैं.

उनमें चिंता, चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है और यहां तक की डिप्रेशन के कगार पर भी पहुंचने लगते हैं.

अमरीका के सिएटल शहर में 'रीस्टार्ट लाइफ सेंटर' नाम का एक रिहैब सेंटर भी है जो इंटरनेट और गेमिंग के आदी लोगों को इस लत से पीछा छुड़ाने में मदद करता है.

इस तरह का रिहैब सेंटर होना भी एक संकेत है कि आने वाले दिन में बच्चों और किशोरों के लिए ये समस्या कितने बड़े रूप में सामने आने वाली है.

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