किसे सुध है मगर तारेगना के ग्रहण की...

बिहार के मसौढी अनुमंडल का एक छोटा सा गाँव तारेगना अचानक ऐसा बहुप्रचारित हो गया है कि लगता है गुमनामी के ग्रहों से मुक्त हो कर निकला हो.

इस सदी के सबसे लंबे पूर्ण सूर्यग्रहण को तारेगना से देखने की होड़ सी लगी है. खगोल शास्त्र के प्रख्यात भारतीय वैज्ञानिक आर्यभट्ट की क्रमस्थली है तारेगना.

पटना से 25 किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व दिशा में स्थित इस जगह से 22 जुलाई 2009 को पूर्ण सूर्ग्रहण भारत में सबसे लंबे समय (तीन मिनट 48 सेकेंड) तक देखा जाएगा.

अमरीकी अंतरिक्ष अध्ययन संस्थान नासा समेत दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने जब तारेगना क्षेत्र के इस ख़ास महत्व की घोषणा की तो चमक उठे तारेगना के सितारे.

क्लिक करें इस ऐतिहासिक महत्व के पूर्ण सूर्यग्रहण वाले दिन की पूर्व संध्या पर जब मैं तारेगना पहुंचा तो वहाँ का माहौल किसी बड़े आयोजन की उमंग से सराबोर लगा.

तारेगना से बेहतर भारत में ऐसी कोई जगह नहीं थी जहाँ से हम पूर्ण सूर्यग्रहण को साफ़-साफ़ और देर तक देख पाते. लगता है कि महान खगोलविद आर्यभट्ट को उनकी कर्मभूमि पर याद करने का हमें यह सौभाग्यपूर्ण मौक़ा मिला है.

अमिताभ पांडेय, वैज्ञानिक

दुर्दशा का शिकार तारेगना

लेकिन ये उमंग या उत्साह ख़ासकर तारेगना डीह गाँव में नहीं के बराबर था. उसके इर्द-गिर्द मसौढी के सरकारी दफ़्तरों वाले इलाक़े में हलचल ज़्यादा थी.

नव निर्मित रफ़रल अस्पताल भवन इसका केंद्र बना हुआ था क्योंकि वहीं पर देश-विदेश के वैज्ञानिकों, मीडियाकर्मियों, मंत्रियों और अधिकारियों के ठहरने और सूर्यग्रहण के दर्शन या अध्ययन की तैयारी की गई है.

तारेगना गाँव, जो तारेगना रेलवे-स्टेशन से मात्र डेढ़ दो किलोमीटर दूर और मसौढी बाज़ार के पीछे है, वहाँ ग्रामीणों में भारी रोष था.

रोष इसलिए कि आर्यभट्ट ने जिस तारेगना डीह यानी टीले पर अपनी प्रयोगशाला बनाकर खगोलीय अध्ययन किया था वहाँ तक पहुंचने के लिए ठीक से एक सड़क तक नहीं बनी.

इस अभावग्रस्त तारेगना गाँव के लोगों ने कहा कि वैज्ञानिकों और सरकारी लोगों को आर्यभट्ट के मूल कर्मस्थल की दूर्दशा देखनी चाहिए थी.

इस गाँव में लोगों के लिए एक छोटा सा बैनर वहाँ के ग्रामीणों ने पेड़ से बांधकर लटका दिया था. ये लोग कह रहे थे सूर्यग्रहण का ये सरकारी और मीडिया मेला जब कल ख़त्म हो जाएगा तो फिर शायद कोई तारेगना को पूछने भी नहीं आएगा कि इस गाँव का क्या हाल है.

लेकिन दूसरी तरफ़ तारेगना रेलवे स्टेशन से लेकर मसौढ़ी अंचल और बाज़ार तक जो भी मिला वह इस बात से ख़ासे प्रसन्न दिखे कि चलो इसी बहाने दुनिया में तारेगना का नाम रौशन तो हुआ.

सूर्यग्रहण (फ़ाइल)

याद आए आर्यभट्ट

तारेगना के पास एक तीन मंज़िले अस्पताल की छत पर टेलिस्कोप और अन्य कई प्रकार के खगोलीय अध्ययन संबंधी उपकरण लगाने में वैज्ञानिकों का जत्था व्यस्त था. लेकिन वहाँ तमाम लोगों को ये आशंका भी खाए जा रही थी कि बुधवार की सुबह सूर्यग्रण के समय पूरब क्षितिज पर घने बादलों के बीच ये सूर्यग्रहण का दृश्य कहीं खो न जाए.

स्पेस नामक संस्था के संस्थापक अध्यक्ष और वैज्ञानिक अमिताभ पाण्डेय अपने रिफ़्लेक्टर टेलिस्कोप वहाँ लगा चुके थे.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "तारेगना से बेहतर भारत में ऐसी कोई जगह नहीं थी जहाँ से हम पूर्ण सूर्यग्रहण को साफ़-साफ़ और देर तक देख पाते. लगता है कि महान खगोलविद आर्यभट्ट को उनकी कर्मभूमि पर याद करने का हमें यह सौभाग्यपूर्ण मौक़ा मिला है."

पटना से लेकर तारेगना तक 25 किलोमीटर के रास्ते में और पूरे मसौढ़ी क्षेत्र में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है ताकि नक्सल प्रभावित इस इलाक़े में कहीं किसी देशी-विदेशी मेहमानों पर कोई ख़तरा न आए.

तारेगना रेलवे स्टेशन के बाहर किसानों के एक वामपंथी संगठन से जुड़े लोग लाल झंडों के साथ प्रदर्शन कर रहे थे.

इन प्रदर्शनकारियों ने कहा, "सूर्यग्रहण को समारोहपूर्वक दिखाने में जीजान से जुटी नीतीश सरकार पहले ये बताए कि यहाँ किसानों की फ़सल पर जो सूखे का ग्रहण लगा है उससे राहत दिलाने के लिए क्या कर रही है."

मंगलवार शाम को तारेगना में जो बारिश हुई उससे वहाँ के किसान तो प्रसन्न हो गए लेकिन ठीक से सूर्यग्रहण देखने की ललक में वहाँ जुटे लोगों के मुँह लटक गए. सबको बुधवार की सुबह एक साफ मौसम और सूर्यग्रहण के नज़ारे का इंतज़ार है....

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