बढ़ रहा है आर्कटिक का तापमान

ग्लेशियर
Image caption दुनिया भर के उन सभी इलाक़ों में बढ़ते हुए तापमान का असर दिख रहा है जहां बर्फ़ है.

अमरीका में हुए नए शोध के मुताबिक आर्कटिक क्षेत्र में पिछले दो हज़ार सालों में ताममान सबसे अधिक हो गया है जो इस बात का संकेत है कि मानवीय गतिविधियों के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि आर्कटिक में पूरे उत्तरी गोलार्ध की तुलना में तीन गुना तेज़ी से तापमान बढ़ रहा है और इसकी वजह मानवीय गतिविधियों से पैदा हो रही कार्बन डाई ऑक्साइड है.

ये शोध अमरीकी पत्रिका जर्नल साइंस में छपा है.

शोध के अनुसार पिछले सात हज़ार वर्षों में एक ऐसी प्राकृतिक स्थिति बननी थी जिसमें आर्कटिक के क्षेत्र को सूरज की कम से कम रोशनी मिलनी चाहिए थी. इस प्रक्रिया के तहत आर्कटिक को अब भी ठंडा होते रहना था. हालांकि ऐसा हुआ नहीं. वर्ष 1900 के बाद आर्कटिक का तापमान बढ़ता जा रहा है और 1950 के बाद इसमें और अधिक तेज़ी आ गई है.

पिछले 2000 वर्षों में आर्कटिक का तापमान अभी सबसे अधिक है. पिछली एक सदी में आर्कटिक का तापमान पूरे उत्तरी गोलार्ध की तुलना में तीन गुना तेज़ी से बढ़ा है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इसमें अब कोई शक नहीं रह गया है कि तापमान बढ़ने की वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ मानवीय गतिविधियों के कारण पैदा होने वाला कार्बन डाई आक्साइड है.

वैज्ञानिकों ने भूगर्भीय रिकार्डों और कंप्यूटरों की मदद से पिछली दो शताब्दियों में तापमानों का खाका तैयार किया है. वैज्ञानिकों ने चेताया है कि अगर आर्कटिक का तापमान बढ़ता ही रहा तो इससे समुद्र के जल स्तर में तेज़ी से बढ़ोतरी हो सकती है

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून भी आर्कटिक के दौरे से लौटे हैं और उन्होंने भी इस पर चिंता जताई है.

उनका कहना था, ''आर्कटिक में हो रहा बदलाव जलवायु परिवर्तन है. आईपीसीसी ने जो कल्पनाएं की थीं वो सही साबित हो रही हैं. आर्कटिक गर्मी को सोख रहा है और बर्फ ख़त्म हो रही है. गर्मी बढ़ रही है. इससे समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा. हम लोग गंभीर खतरे की तरफ़ बढ़ रहे हैं.''

महासचिव ने जेनेवा में दिए भाषण में कहा कि अगर विश्व भर के नेताओं ने जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठाए तो दुनिया को सर्वनाश से कोई नहीं बचा सकता है.

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