नई पीढ़ी का वाई-फ़ाई मंज़ूर

लैपटॉप कंप्टूटर
Image caption बेतार इंटरनेट कनेक्शन यानी वाई-फ़ाई कई वर्षो से लैपटॉप में चल रहे थे

लैपटॉप कंप्यूटर में बेतार इंटरनेट तकनीक यानी वाई-फ़ाई को आख़िरकार स्वीकृति दे दी गई है, हालाँकि यह तकनीक कई वर्षों से इस्तेमाल हो रही है.

बेतार इंटरनेट कनेक्शन को वाई-फ़ाई कहा जाता है जिसका विशिष्ट नाम 802.11एन तकनीक है. इसे वाई-फ़ाई के मानक तय करने वाली संस्था आईईईई ने मंज़ूरी दी है जिसके बाद यह अब स्वीकृत तकनीक बन गई है.

इस तकनीक को बाज़ार में सात वर्ष पहले उतारा गया था. यह तकनीक 802.11एन मौजूदा स्वीकृत तकनीक से कम से कम छह गुना ज़्यादा रफ़्तार से इंटरनेट पर काम करती है.

कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियाँ बहुत से लैपटॉप और अन्य उपकरण इस तकनीक को लगाकर कई वर्षों से बेचती रही हैं, फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि वे अपने इन उपकरणों पर 802.11एन इन ड्राफ़्ट की मोहर लगाती थीं.

यह मोहर दर्शाती थी कि इस तकनीक को अंतरराष्ट्रीय मानक संस्था आईईईई की मंज़ूरी नहीं मिली थी लेकिन यह तकनीक काफ़ी सफल रही है और लोकप्रिय भी हुई है.

लेकिन आईईईई की स्वीकृति के बिना यह गारंटी नहीं थी कि भविष्य में अगर नेटवर्किंग के कोई उपकरण बनाए जाएंगे वो इस तकनीक यानी 802.11एन से मेल खाएंगे ही.

कई गुना रफ़्तार

अब आईईईई की मोहर लग जाने के बाद यह बाधा हट गई है और बेतार इंटरनेट कनेक्शन की दुनिया में सफल हो चुकी 802.11एन अब एक मानक तकनीक बन गई है.

कंप्यूटरों में वायरलैस नेटवर्किंग के उपकरणों के मानकों पर परीक्षण करने वाली संस्था वाई-फ़ाई अलायंस ने कहा है कि 802.11एन ड्राफ़्ट तकनीक वाले सभी उपकरण अब बिना किसी रोक-टोक के काम करते रहेंगे.

आईईईई के ब्रूस क्रेमर का कहना था, "यह एक असाधारण चुनौती थी जिसका बहुत व्यापक असर होने वाला था. जब हमने 2002 में इस तकनीक पर काम शुरू किया था तो 802.11एन पर अनेक विश्वविद्यालयों के शोध प्रकाशित तो हो चुके थे लेकिन उस तकनीक को ठोस तरीके से लागू नहीं किया गया था."

आदर्श रूप में 802.11एन तकनीक 300 मेगाबाइट्स प्रतिसेकंड की रफ़्तार से काम कर सकती है, कुछ मामलों में तो इससे भी ज़्यादा रफ़्तार से.

यह रफ़्तार इससे पहली पीढ़ी की तकनीक यानी 802.11जी की रफ़्तार से कई गुना ज़्यादा होगी. पुरानी पीढ़ी की यह तकनीक 54 मेगाबाइट्स प्रतिसेकंड की रफ़्तार से कनेक्शन जोड़ती है.

नई तकनीक यानी 802.11एन 90 मीटर यानी 300 फुट की दूरी पर काम करते हुए भी डाटा ट्रांसफ़र कर सकती है. यह रफ़्तार इससे पहले की पीढ़ी की तकनीक से दोगुना है.

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