गुणसूत्रों पर खोज के लिए नोबेल पुरस्कार

गुणसूत्र
Image caption मानव शरीर में गुणसूत्र आनुवंशिक गुणों के वाहक होते हैं

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इस बार का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार गुणसूत्रों पर काम के लिए अमरीका स्थित तीन वैज्ञानिकों को देने की घोषणा की गई है.

वैज्ञानिकों ने एलिज़बेथ ब्लैकबर्न, कैरोल ग्राइडर और जैक शोस्टाक ने इस बात की खोज की है कि मानव शरीर कैसे क्रोमोज़ोम्स या गुणसूत्रों की रक्षा करता है.

पुरस्कार की घोषणा करते हुए स्वीडन स्थित कैरोलिंस्का इंस्टीच्युट ने कहा है कि तीनों वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगाकर जीव विज्ञान की एक बहुत बड़ी गुत्थी सुलझा दी है कि कोशिकाओं के विभाजन के समय गुणसूत्रों की प्रतिकृति कैसे बनती है और कैसे वे ख़राब नहीं होतीं.

उनकी इस खोज से मानवों के वृद्ध होने के कारणों, कैंसर और स्टेम कोशिकाओं के बारे में और जानकारी जुटाने में सहायता मिलेगी.

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में पहली बार दो महिलाओं को नोबेल पुरस्कार मिला है.

60 वर्षीया एलिज़बेथ ब्लैकबर्न युनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया में पढ़ाती हैं और वे अमरीका तथा ऑस्ट्रेलिया की नागरिक हैं.

48 वर्षीया कैरोल ग्रेइडर बाल्टिमोर स्थित जॉन्स हॉपकिन्स युनिवर्सिटी में प्राध्यापक हैं.

जैक ज़ोस्ताक हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से जुड़े रहे हैं और वे अभी बोस्टन स्थित मैसाचुसेट्स जेनरल हॉस्पिटल में कार्यरत हैं.

नोबेल पुरस्कार 10 दिसंबर को स्टॉकहोम में दिए जाएँगे.

खोज

मानव शरीर कोशिकाओं से बना होता है और इन कोशिकाओं में गुणसूत्र या क्रोमोज़ोम्स होते हैं.

एक सामान्य मनुष्य में 46 गुणसूत्र होते हैं. गुणसूत्रों को मानव के आनुवंशिक गुणों का वाहक माना जाता है.

छड़ों की आकृति वाले गुणसूत्रों के भीतर डीएनए होते हैं. इन गुणसूत्रों के अंतिम सिरों पर टेलोमीटर होते हैं.

इस बार के नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने इसी टेलोमेयर और उसको बनानेवाले एंज़ाइम टेलोमेरेज़ का पता लगाया है.

नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि गुणसूत्रों की नकल के बनने का सारा रहस्य छिपा रहता है दो चीज़ों में – टेलोमेयर और टेलोमेरेज़ में.

टेलोमेयर जूते के फ़ीते के सिरे पर लगे होनेवाली प्लास्टिक की गाँठ के समान होते हैं.

ऐसी आशा की जाती है कि टेलोमेरेज़ को ख़त्म करने से कैंसर का निदान निकल सकता है.

साथ ही कई आनुवंशिक बीमारियों का कारण भी टेलोमेरेज़ में आए दोष होते हैं और इस वर्ष के नोबेल विजेताओं की खोज से इन बीमारियों के हल में भी मदद मिल सकती है.

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