कार्बन क्रेडिट का नुसख़ा कारगर नहीं रहा

कार्बन छोड़ते कारख़ाने
Image caption कार्बन क्रेडिट का फ़ॉमूला क्योटो प्रोटोकॉल में लाया गया था

जलवायु परिवर्तन पर क़ाबू पाने के लिए कार्बन क्रेडिट का फॉर्मूला बहुत कारगर साबित नहीं हुआ है, इसके तहत कंपनियों को अच्छी तकनीक अपनाकर कार्बन उत्सर्जन में कमी करना होता है.

कोपेनहेगन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में कार्बन क्रेडिट भी एक अहम मुद्दा होगा. ये विचार बारह साल पहले क्योटो सम्मेलन में उस समय आया जब दुनिया के नेताओं को इस बात के लिए बाध्य होना पड़ा कि उनके देशों को कार्बन उत्सर्जन में कटौती करनी होगी.

विकास का दूसरा नाम औद्योगीकरण है. कारख़ाने, फ़ैक्ट्रियाँ, डीज़ल और पेट्रोल पर चलने वाले मोटरवाहन और जहाज़ सभी वातावरण में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित करते हैं. यहाँ तक कि लोग अपने घरों में किस तरह का बल्ब इस्तेमाल करते हैं उसका भी वातावरण पर असर पड़ता है.

ओज़ोन, नाइट्रस ऑक्साइड, मिथेन के साथ ही टरबाइन और जेनरेटर से निकलने वाले विभिन्न प्रकार के गैस और उनमें सम्मिलित कार्बन डाइऑक्साइड का सबसे अधिक असर जलवायु परिवर्तन पर हो रहा है.

सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के चंद्रभूषण का कहना है, "कार्बन उत्सर्जन के तेज़ी से बढ़ने की वजह यह है कि हम काफ़ी मात्रा में कोयला और पेट्रोलियम पदार्थों को जला रहे हैं, जो कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं और ये वातावरण में जमा हो रहे हैं."

नई तकनीक की ज़रूरत

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या जलवायु परिवर्तन पर क़ाबू पाने के लिए औद्योगीकरण पर रोक लगाया जा सकता है? पर इस बात से किसी का इनकार नहीं है कि प्रगति पर रोक नहीं लगाई जा सकती है, लेकिन कुछ बदला जा सकता है तो वो है तकनीक. यानी ऐसी तकनीक का इस्तेमाल हो जिनसे ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन कम हो.

वर्ष 1997 में इसी चीज़ को बदलने की शुरुआत हुई जापान के शहर क्योटो में. जहाँ जलवायु परिवर्तन पर क़ाबू पाने के लिए बड़ा सम्मेलन हुआ और तय हुआ कि हर देश को कार्बन का उत्सर्जन कम करना होगा. यानी कंपनियों को तकनीक में सुधार लाना होगा. जिसके लिए कार्बन क्रेडिट का सिद्धांत शुरू किया गया.

कार्बन क्रेडिट के सिद्धांत के तहत जो कंपनियाँ अच्छी तकनीक का इस्तेमाल कर कार्बन उत्सर्जन कम करेंगी उन्हें कार्बन क्रेडिट मिलेगा और ऐसा करने वाली कंपनियाँ अपना सामान उन देशों में बेच सकेंगी जहाँ कार्बन उत्सर्जन अधिक है.

चंद्रभूषण मानते हैं कि इसका कोई बड़ा फ़ायदा नहीं हुआ है फिर भी इस तरीक़े को अपना कर कई कंपनियों ने अधिक पैसा ज़रूर कमाया है.

उनका कहना है, "कार्बन क्रेडिट के बाज़ार में चीन और भारत है, कहने के लिए तो उत्सर्जन कम हुए हैं, लेकिन दुनियाभर का आँकड़ा देखें तो इसमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा है. कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बढ़ते जा रहा है यानी इस कार्बन क्रेडिट का कोई फ़ायदा हुआ नहीं है."

भारत में रिलायंस इंटस्ट्रीज़, मफ़तलाल इंटस्ट्रीज़, गुजरात अमबुजा सीमेंट और ऐसीसी जैसी कंपनियों ने कार्बन क्रेडिट का उपयोग किया है. लेकिन क्या इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है, इसपर अबतक आम राय नहीं बन सकी है.

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