विकसित देशों का रवैया

ओबामा
Image caption अमरीका ने क्योटो प्रोटोकॉल ख़ारिज ही कर दिया था.

सत्रह साल पहले रियो में पृथ्वी सम्मेलन के आयोजन के बाद से संयुक्तराष्ट्र ने बढ़ते कार्बन उत्सर्जन के ख़तरों को लेकर जागरुकता बढ़ाने का अभियान लगातार जारी रखा है. उसका परिणाम ये हुआ है कि पूरी दुनिया में लगभग आम सहमति है कि बेलग़ाम कार्बन उत्सर्जन से धरती गर्म होती जा रही है, और यदि ग्लोबल वार्मिंग की मौजूदा दशा को ठीक करने की कोशिश नहीं की गई, तो मानवता को इसका गंभीर परिणाम भुगतना होगा.

संयुक्तराष्ट्र गठित वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय कमेटी आई.पी.सी.सी. की रिपोर्टों ने, और दुनिया भर के कई अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के आकलनों ने, औद्योगीकृत देशों को ये मानने के लिए बाध्य कर दिया कि अब तक की ग्लोबल-वार्मिंग के लिए वे ही ज़िम्मेवार हैं. लेकिन इसके दुष्प्रभावों को कम करने के लिए निदानात्मक उपायों के कार्यान्वयन में वे अब भी बहुत पीछे हैं.

यूरोप के देशों और जापान ने तो क्योटो जलवायु संधि के बाद कार्बन उत्सर्जन में कटौती के कुछ लक्ष्य निर्धारित भी किए, लेकिन अमरीका ने पहली बार पिछले सप्ताह अपने कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य निर्धारित किया है. ख़बरों के अनुसार वर्ष 2020 तक ये कटौती 17 प्रतिशत की होगी. हालाँकि ये कटौती 1990 के स्तर के मुक़ाबले नहीं, बल्कि 2005 के मुक़ाबले होगी.

लेकिन इसके साथ ही सर्वाधिक ग्रीनहाउस गैस वायुमंडल में छोड़ने वाले देशों में दूसरे नंबर पर आने वाला अमरीका, कोपेनहेगेन सम्मेलन में चीन, भारत, दक्षिण अफ़्रीका और ब्राज़ील पर ऐसे ही लक्ष्य घोषित करने का दबाव डालेगा. हालाँकि चीन और भारत ने कह दिया है कि वे कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि की रफ़्तार को कम करने की कोशिश ज़रूर करेंगे, उत्सर्जन में कमी का उनका कोई इरादा नहीं है.

यूरोपीय देश

जहाँ तक यूरोपीय देशों की बात है, तो यूरोपीय संघ ने जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में कोई-न-कोई समझौता कराने के लिए हरसंभव प्रयास करने का इरादा जताया है.

यूरोपीय देश 2020 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को 1990 के स्तर के मुक़ाबले 20 प्रतिशत कम करने को तैयार हैं, और यूरोपीय संघ का कहना है कि यदि बाक़ी दुनिया से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली तो इस लक्ष्य को बढ़ा कर 30 प्रतिशत किया जा सकता है.

यूरोपीय संघ के देश चीन और अमरीका के बाद इस समय संयुक्त रूप से दुनिया के तीसरे सबसे बड़े प्रदूषक हैं. उनकी कोशिश होगी कि कोपेनहेगेन में धनी देश सैद्धांतिक रूप से ही सही 2050 तक अपने उत्सर्जन में 80 प्रतिशत तक की कटौती के लिए सहमत हो जाएँ.

एक और प्रमुख औद्योगीकृत देश जापान की सरकार का कहना है कि यदि कोपेनहेगेन में बाक़ी धनी देश अपने कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती को तैयार होते हैं, तो जापान अपना कार्बन उत्सर्जन 2020 तक 1990 के मुक़ाबल 25 प्रतिशत कम कर देगा.

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