लंबी हो सकती है इंतज़ार की घड़ी

Image caption विकसित और विकासशील देशों के बीच कई मुद्दों के लेकर मतभेद हैं.

कोपेनहेगन में चल रहे जलवायु सम्मेलन में डेनमार्क ने किसी ठोस समझौते की उम्मीद के आसार कम बताए हैं. सम्मेलन की अध्यक्षता मेज़बान डेनमार्क के हाथों में है.

अधिकारियों ने कहा है कि बातचीत में प्रगति हो सकती है लेकिन किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते के लिए शायद मेक्सिको में 2010 में होने वाली बैठक का इंतज़ार करना होगा.

कोपेनहेगन वार्ता में बातचीत में गतिरोध तो समाप्त हो गया है लेकिन विकासशील देशों के विरोध के बाद मेज़बान डेनमार्क को नया प्रस्तावित मसौदा पेश करने की योजना रद्द करनी पड़ी. डेनमार्क गुरुवार को ये प्रस्तावित मसौदा पेश करने वाला था.

एक सूत्र ने डेनमार्क के एक अख़बार को बताया, "हम लोग पागलों की तरह भिड़े हुए हैं, हमने अभी हार नहीं मानी है लेकिन हमें बड़े नेताओं की मदद की ज़रूरत है."

कम होती उम्मीद

ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कौन कटौती करेगा, कितनी कटौती करेगा और ग़रीब देशों को कितनी मदद मिलनी चाहिए- इसे लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं.

लेकिन वार्ता में कुछ प्रगति ज़रूर हुई है. जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अमीर देशों ने नए धनकोष की बात कही है.

अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा है कि उनका देश इसके लिए तैयार है कि विकासशील देशों के लिए सालाना 100 अरब डॉलर की धनराशि जुटाई जाए.

लेकिन जापान की तरह अमरीका ने स्पष्ट कर दिया है कि वो कितना पैसा देगा ये इस पर निर्भर करेगा कि नया समझैता उसके मानकों पर पूरा उतरे.

बीबीसी संवाददाता रिचर्ड ब्लैक का कहना है कि विकाशशील देशों का तर्क यही रहने वाला है कि अमरीका ये क्यों नहीं बता सकता कि वो कितना पैसा देने को तैयार है.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने कहा है कि अपने हितों की राजनीति के कारण एक ऐसी नीति को नहीं रोका जाना चाहिए जिस पर मनुष्यों का अस्तित्व टिका हो.

शुक्रवार को अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा कोपेनहेगन पहुँचेगे. भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शुक्रवार को सम्मेलन में मौजूद रहेंगे.

पहले उम्मीद की जा रही थी कि शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएँगे. ये समझौता क्योटो संधि की जगह लेने वाला था जो 2012 के बाद ख़त्म हो जाएगी.

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