कोपेनहेगन में समझौते पर संशय

कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के अंतिम दिन राष्ट्रप्रमुख वहाँ एकत्रित होकर चर्चा कर रहे हैं.

हालांकि किसी सर्वमान्य अंतिम समझौते को लेकर अभी भी संशय बना हुआ है.

अमरीका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर राजनीतिक समझौते का जो मसौदा तैयार किया था उसे रात भर चली चर्चा के बाद ख़ारिज कर दिया गया है.

सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों ने इस स्थिति को भ्रम की स्थिति बताया है.

कहा गया है कि देशों के बीच मूलभूत मतभेद अभी भी क़ायम हैं.

बीबीसी के पर्यावरण संवाददाता रिचर्ड ब्लैक का कहना है कि पिछले दो हफ़्तों से कुछ विकासशील देश लगातार यह शिकायत कर रहे हैं कि डेनमार्क और पश्चिमी देश लगातार उनको दबाने का प्रयास कर रहे हैं.

जिनीवा के एक थिंक टैंक साउथ सेंटर के कार्यकारी निदेशक मार्टिन नोर का कहना है, "बड़ी भ्रम की स्थति है और विकासशील देश इस बात से बहुत निराश हैं क्योंकि उन्होंने संभावित समझौते के लिए तैयार मसौदे पर चर्चा करने में बहुत समय लगाया है. क्योटो संधि पर चर्चा पिछले चार साल से चल रही है."

बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, "अब दूसरी चीज़ें क्योटो संधि के ऊपर उभर आई हैं और लोगों को लग रहा है कि उनका समय नष्ट हो गया."

सम्मेलन के दौरान हमेशा कुछ मुद्दे रहे जिसकी वजह से रोड़ा अटकता रहा. मसलन मसौदों में क़ानूनी रुप से बाध्यकारी समझौते को लेकर कोई प्रतिबद्धता ज़ाहिर नहीं की गई थी, जो कि कई विकासशील देशों की प्रमुख मांग थी.

संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण मामलों के निदेशक एचिम एस्टेनर ने बीबीसी से कहा, "अब तो राष्ट्र प्रमुख ही इस सम्मेलन के अंत को सफल बना सकते हैं."

इसकी कोशिश में मंत्रियों ने अपनी सुबह की प्रेस मीटिंग रद्द कर दीं ताकि वे सहमति बनाने के लिए समय दे सकें.

इस समय राष्ट्रप्रमुख सम्मेलन में अपने दृष्टिकोण रख रहे हैं.

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