कोपेनहेगन से सबक लें:ब्राउन

Image caption कोपेनहेगन सम्मेलन के नतीजे पर ब्राउन ने असंतोष जताया

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने कहा है कि मुट्ठी भर देशों ने अपने रवैये से कोपेनहेगन सम्मेलन को अगवा कर लिया और दोबारा ऐसा नहीं होना चाहिए.

गॉर्डन ब्राउन ने कहा कि जिस तरह पूरी बातचीत हुई उससे सबक सीखने की ज़रूरत है और वे समझौते के लिए कोशिश करते रहेंगे.

दरअसल यूरोपीय देशों को उम्मीद थी कि अमरीका और चीन बातचीत के दौरान कुछ और रियायतें देंगे और लचीला रुख़ अपनाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ का तर्क था कि विश्व में सबसे ज़्यादा गीनहाउस गैसों का उत्सर्जन अमरीका करता है, इसलिए अमरीका को ज़्यादा कटौती करनी चाहिए और ऊर्जा के बेहतर स्रोत्रों के लिए ग़रीब देशों को और पैसा देना चाहिए.

क्यों नहीं हुआ समझौता?

बीबीसी संवाददाता रॉजर हैराबिन का कहना है कि सूत्रों के मुताबिक वेन जियाबाओ कोपेनहेगन में कोई तोलमोल नहीं बल्कि समझौते पर हस्ताक्षर करने के इरादे से आए थे.

बीबीसी संवाददाता के मुताबिक अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा शायद इस इरादे से आए थे कि चीन के प्रति कड़ा रवैया अपनाकर वे सिनेट को प्रभावित करना चाहते थे.

वे बातचीत में कोई नई पेशकश लेकर नहीं आए. उनकी मांग थी कि उत्सर्जन पर निगरानी रखने को लेकर चीन अपना रुख़ बदले. बीबीसी संवाददाता के मुताबिक अंत में चीन ने थोड़ा बहुत समझौता किया लेकिन अमरीका ने बिल्कुल भी नहीं.

बहुत सारे देशों ने चीन पर आरोप लगाया है कि 2050 तक ग्लोबल उत्सर्जन में 50 फ़ीसदी की कटौती का लक्ष्य तय करने में चीन ने बाधा डाली.

लेकिन चीन का कहना है कि ऐसा करने से विकासशील देशों पर एक सीमा लग जाएगी जो सही नहीं होगी बशर्ते कि अमीर देश उन्हें ऊर्जा के बेहतर स्रोत विकसित करने के लिए अधिक पैसे दें.

अभी हर साल 100 अरब डॉलर से कुछ कम की राशि देने की पेशकश है. वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति हूगो शावेज़ का कहना है कि ये अमरीका के सालाना रक्षा बजट का 16 फ़ीसदी भी नहीं है.

कुछ विशलेषकों का मानना है कि ये पेशकश वाकई इतनी कम है कि इससे अच्छा तो होता कि वार्ता टूट जाती.

जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल जल्द ही एक और जलवायु सम्मेलन बुलाने की कोशिश में जुटी हैं जबकि अगले साल संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन मेक्सिको में होगा.

इस दौरान बड़े देशों की कोशिश रहेगी कि कुछ देशों को वे विशेष मित्र देशों के तौर पर वार्ता में शामिल करें ताकि बातचीत के लिए मसौदा तैयार करने में वैसी फ़ज़ीहत न हो जैसी कोपनहेगन में हुई.

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