बीटी बैंगन की खेती पर बहस शुरू

बैंगन
Image caption भारत में बैंगन की सब्ज़ी को बड़े पैमाने पर पसंद किया जाता है

भारत में जैविक रूप से संशोधित बैंगन की पैदावार करने या नहीं करने के मुद्दे पर सार्वजनिक बहस शुरू हुई है और इसके पहले भाग के रूप में कोलकाता में बुधवार को हुई बातचीत की अध्यक्षता पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने की.

इस तरह उगाए जाने वाले बैंगन को आमतौर पर बीटी बैंगन कहा जाता है. इस मुद्दे पर अभी अनेक चरणों और शहरों में बहस होनी है जो फ़रवरी में समाप्त होंगे.

उसके बाद ही भारत सरकार जैविक रूप से संशोधित बैंगन की खेतीबाड़ी के बारे में कोई अंतिम निर्णय लेगी. भारत में बैंगन की सब्ज़ी ख़ासी बड़ मात्रा में खाई जाती है.

इस बातचीत में सरकारी अधिकारी, वैज्ञानिक, किसान और पर्यावरणविद हिस्सा ले रहे हैं.

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कोलकाता में सरकार का रुख़ रखते हुए कहा कि सरकार बीटी बैंगन के बारे में खुले दिमाग़ से आगे बढ़ रही है और बातचीत से जो भी परिणाम निकलेगा उसको महत्व दिया जाएगा.

भारत में जैव प्रोद्योगिकी पर नियंत्रण रखने वाली संस्था जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी यानी जीईएसी ने बीटी बैंगन की व्यासायिक पैमाने पर खेतीबाड़ी को अक्तूबर 2009 में ही मंज़ूरी दे दी थी.

जयराम रमेश ने कहा है कि वो इस मुद्दे पर व्यापक सार्वजनिक बहस की हिमायत करते हैं. उन्होंने कहा कि इस बारे में छह राज्यों के मुख्य मंत्रियों को भी पत्र लिखे गए हैं जहाँ बैंगन की पैदावार बड़े पैमाने पर होती है.

उन्होंने कहा कि साथ ही देश के पचास शीर्ष कृषि वैज्ञानिकों को भी इस मुद्दे पर राय देने के लिए लिखा गया है.

अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी मोन्सेंटो और उसकी भारतीय साझीदार कंपनी महाइको बीटी बैंगन की खेतीबाड़ी व्यावसायिक पैमाने पर करने के लिए भारी दबाव डाल रही हैं क्योंकि इन कंपनियों ने भारतीय कृषि वातावरण के लिए उपयुक्त बीज पहले ही तैयार कर लिया है.

लेकिन किसानों के संगठन और पर्यावरणवादियों के गुट बीटी बैंगन और जैविक रूप से संशोधित अन्य फ़सलों की व्यावसायिक पैदावार का घोर विरोध कर रहे हैं क्योंकि वे भारत में खेतीबाड़ी और पर्यावरण पर लंबी अवधि में इसके प्रभावों को लेकर चिंतित हैं.

ग़ौरतलब है कि यूरोप में जैविक रूप से संशोधित चीज़ों की खेतीबाड़ी को प्रतिबंधित कर दिया है और इसी से प्रेरित होकर भारत में भी किसान और पर्यावरणविद जैविक रूप से संशोधित चीज़ों की पैदावार का विरोध कर रहे हैं.

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