सरहद पार से दिल जोड़े इंटरनेट ने

कंप्यूटर देखती महिला
Image caption शहनाज़ परवीन दिन में कई घंटे अपने रिश्तेदारों से बात करने में बिताती हैं

रिफ़्यूजी फ़िल्म का एक गाना है, पंछी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके....

इसी कड़ी में एक नाम शामिल हो गया है इंटरनेट का. इसकी पहुँच भी किसी सरहद की मोहताज नहीं है. आप न केवल घर बैठे देश-दुनिया से जुड़ते हैं बल्कि एक दूसरे की आवाज़ सुनते हैं, उनके चेहरे देखते हैं.

भारत के कई परिवार ऐसे हैं जिनके कुछ सदस्य विभाजन के समय या उसके कुछ बाद पाकिस्तान चले गए थे. आज उनमें से कई परिवार इंटरनेट के ज़रिए एक दूसरे के क़रीब आ गए हैं.

दिल्ली की शहनाज़ परवीन लाहौर और कराची में रह रहे अपने रिश्तेदारों से फ़ोन पर बात करती थीं लेकिन उससे जी नहीं भरता था. वह कहती हैं, फ़ोन पर बात होती थी लेकिन बहुत महंगी पड़ती थी. इसलिए दो-चार मिनट बात करके फ़ोन रख दिया करते थे. अब जबसे इंटरनेट कनेक्शन लिया हो तो रात को खाने के बाद रोज़ाना दो घंटे बात होती है.

दिल्ली की ही मुसर्रत को जब इस माध्यम के बारे में पता चला तो उन्होंने लाहौर और कराची में अपने रिश्तेदारों की तलाश शुरू की. इसके लिए उन्होंने फ़ेसबुक का सहारा लिया. कुछ मिले तो कुछ के बारे में पता नहीं चल पाया. लेकिन वह इस माध्यम से बहुत संतुष्ट हैं.

इंटरनेट के साथ वेबकैम को कई लोग सोने पर सुहागा मानते हैं. शहनाज़ परवीन की बेटी की शादी हुई तो पाकिस्तान में रहने वाली उनकी बहन तो आ गईं लेकिन वह इस बात को लेकर दुखी थीं कि उनके बच्चे अपनी बहन की शादी में शिरकत करने से महरूम रह गए. लेकिन उसका इलाज था वेबकैम.

शहनाज़ परवीन कहती हैं, "हमने वेबकैम लगा दिया और पाकिस्तान में रहने वाले मेरे भांजे-भांजियों ने शादी की सारी रस्में देखीं. ऐसा लगा जैसे वे हमारे साथ ही शामिल हों".

तीज-त्योहार पर भी...

यानी शादी का नज़ारा सबने देखा लेकिन तीज-त्योहार...पाकिस्तान में रह रहे हिंदू परिवार इस समय विशेष तौर पर कुछ अकेलापन महसूस करते हैं.

भारत में होली और दीवाली की रौनक़ को याद करके इस्लामाबाद में रहने वाले डॉक्टर राजकुमार अकसर परेशान हो जाते थे. भारत के औरंगाबाद शहर में बसे उनके संबंधी इस त्योहार का पूरा आनंद लेते थे. लेकिन उसका भी हल निकल आया.

वह कहते हैं, "होली-दीवाली पर हम अपने घरवालों को याद करके दुखी हो जाते थे. भारत में इन त्योहारों की छटा ही कुछ अलग होती है. लेकिन इस बार मेरे रिश्तेदारों ने वेबकैम के ज़रिए हमें यह सारा नज़ारा दिखाया. हमने उन्हें पटाख़े फोड़ते भी देखा".

मुसर्रत कहती हैं कि इस समय के हालात को देखते हुए भारत से पाकिस्तान जाना या वहाँ से किसी का आना इतना आसान नहीं रहा है. काग़ज़ी कार्रवाई में काफ़ी समय निकल जाता है और अगर सही काग़ज़ न हों तो फिर तो परेशानी और बढ़ जाती है.

लेकिन इंटरनेट ने इसका भी निदान कर दिया. मुसर्रत ने ज़रूरी काग़ज़ स्कैन करके भेजे और काम बन गया.

पहले ख़त, फिर फ़ोन और अब इंटरनेट. दुनिया बहुत क़रीब आ गई है. भारत और पाकिस्तान की सरहदें अब भी एक दूसरे को चाहने वालों को दूर किए हुए हैं लेकिन उन्होंने अब यह माध्यम ढूँढ लिया है एक दूसरे से जुड़ने का. और दूरी का अहसास दूर तो नहीं, लेकिन काफ़ी हद तक कम ज़रूर हो गया है.

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