झूठ बोले कौआ काटे..

महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में झूठ बोलने की फ़ितरत ज़्यादा होती है. और तो और झूठ बोलने के बाद पुरुषों को मलाल भी कम होता है.

ये बातें एक सर्वेक्षण में सामने आई हैं. करीब तीन हज़ार लोगों के सर्वेक्षण के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि एक ब्रितानी पुरुष औसतन दिन में तीन बार झूठ बोलता है यानी साल भर में 1092 झूठ.

जबकि महिलाएँ साल भर में केवल 728 बार ही झूठ बोलती हैं यानी दिन में दो बार.

ये अध्ययन साइंस म्यूज़ियम ने कमिशन किया था. म्यूज़ियम के मुताबिक सबसे ज़्यादा झूठ लोग अकसर माँ से बोलते हैं.

25 फ़ीसदी पुरुषों ने माना कि उन्होंने अपनी माँ से झूठ बोला जबकि केवल 20 फ़ीसदी महिलाएँ अपनी माँ से झूठ बोलती हैं. वैसे माँ के मुकाबले लोग अपने साथी से कम झूठ बोलते हैं.

'मैंने ज़्यादा शराब नहीं पी'

जिन बातों के लिए लोग झूठ का सहारा लेते हैं वो भी कम दिलचस्प नहीं है.

पुरुषों ने बताया कि वे अकसर अपने जीवनसाथी से शराब पीने को लेकर झूठ बोलते हैं. उनका पसंदीदा वाक्य है, “मैने ज़्यादा नहीं पी.”

अगर आपकी महिला मित्र हैं तो हो सकता है आपने ये वाक्य ज़रूर सुना होगा- ‘कुछ नहीं हुआ. मैं बिल्कुल ठीक हूँ’.

सर्वेक्षण के मुताबिक अपनी भावनाओं को छिपाने के लिए महिलाएँ अक्सर ये झूठ बोलती हैं.

लेकिन झूठ बोलने के बाद महिलाओं को काफ़ी अफ़सोस होता है. 82 फ़ीसदी महिलाओं ने बताया कि झूठ बोलने के बाद ये बात उन्हें कटोचती रहती है. जबकि केवल 70 फ़ीसदी पुरुष ही ऐसा महसूस करते हैं.

यहाँ सवाल ये उठता है कि क्या हम किसी झूठ को स्वीकार्य बता दे सकते हैं? करीब 84 फ़ीसदी लोग मानते हैं कि ऐसा होता है.

तीन चौथाई लोगों का मानना है कि अगर हम चाहते हैं कि सामने वाले की भावनाएँ आहत न हों तो झूठ बोलने में कोई हर्ज़ नहीं.

सर्वेक्षण के मुताबिक अगर किसी को मिला तोहफ़ा उन्हें पसंद नहीं आया हो तो 57 फ़ीसदी लोगों को झूठ बोलने में परेशानी नहीं होगी.

साइंस म्यूज़ियम की केटी मैग्स कहती हैं कि इस बात पर शोध चल रहा है कि क्या हम झूठ अपनी जीन की वजह से बोलते हैं या हमारे पालन-पोषण का इस पर असर होता है.

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