आईपीसीसी में मूलभूत सुधारों का सुझाव

हिमालय

एक अंतरराष्ट्रीय समीक्षा के बाद कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु विज्ञान की संस्था आईपीसीसी में मूलभूत सुधारों की ज़रुरत है, जिसमें इसके मुखिया के कार्यकाल को कम करना भी शामिल है.

सराकारों के बीच जलावायु परिवर्तन पर काम करने वाले पैनल (आईपीसीसी) पर वर्ष 2007 में जलवायु विज्ञान संबंधी अपने आख़िरी सबसे बड़े आकलन में हुई ग़लतियों की वजह से ख़ासा दबाव रहा है.

हालांकि इस समीक्षा में पहले किए गए जलवायु संबंधी आकलनों के लिए आईपीसीसी की सराहना की गई है.

इस रिपोर्ट में ये भी प्रस्तावित किया गया है कि जिस तरह से इस संस्था का संचालन होता है, और जिस तरह से जलवायु विज्ञान को प्रस्तुत किया जाता है, उसमें बदलाव किए जाने की ज़रूरत है.

आईपीसीसी की कार्यप्रणाली का विरोध करने वाले कुछ लोगों ने आईपीसीसी के चेयरपर्सन डॉ. राजेंद्र पचौरी से इस्तीफ़े की माँग की थी. लेकिन न्यूयॉर्क में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने कहा कि वे परिवर्तनों को लागू करने के लिए अभी पद पर बने रहना चाहते हैं.

आईपीसीसी ने ये माना है कि 2007 की अपनी रिपोर्ट में ये कहकर उन्होंने ग़लती की थी कि हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं और वो 2035 तक लुप्त हो जाएँगे.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इस ग़लती से मानव जनित जलवायु परिवर्तन की बड़ी तस्वीर में कोई बदलाव नहीं आया है.

समीक्षा और अनुशंसा

Image caption पचौरी परिवर्तन में सहयोग के लिए पद पर बने रहना चाहते हैं

इसी साल फ़रवरी में संयुक्त राष्ट्र के एक दल ने सुझाव दिया था कि आईपीसीसी की एक स्वतंत्र समीक्षा की ज़रुरत है क्योंकि हो सकता है कि 20 साल पुराने नियमों और कार्यप्रणाली में परिवर्तन की ज़रुरत हो.

इसके बाद समीक्षा का कार्य इंटर अकादमी काउंसिल (आईएसी) को सौंप दिया गया था. आईएसी विज्ञान के मामलों से जुड़ी विश्व भर की कई संस्थाओं का एक अंतर्राष्ट्रीय गुट है.

आईएसी का प्रस्ताव है कि संयुक्त राष्ट्र आईपीसीसी के रोज़मर्रा के काम देखने और उसकी तरफ़ से बात रखने के लिए एक कार्यकारी निदेशक नियुक्त करे.

उसका ये भी कहना है कि आईपीसीसी के अध्यक्ष के लिए छह-छह साल का दो कार्यकाल बहुत लंबा समय होता है.

रिपोर्ट में प्रस्तावित है कि संस्था के अध्यक्ष और कार्यकारी निदेशक का कार्यकाल जलवायु विज्ञान की समीक्षा के एक कार्यकाल तक ही सीमित रखा जाना चाहिए.

पारदर्शिता पर बल

Image caption कोपेनहेगन सम्मेलन में राजनीतिक सहमति न बन पाने के बाद भी निराशा व्यक्त की गई थी

आईएसी का ये भी प्रस्ताव है कि संयुक्त राष्ट्र एक कार्यकारी समिति का गठन करे जिसमें उन लोगों को भी शामिल किया जाए जो आईपीसीसी और जलवायु विज्ञान से जुड़े हुए नहीं हैं.

आईएसी का कहना है कि इससे संयुक्त राष्ट्र के पैनल की विश्वसनीयता और उसकी स्वतंत्रता बढ़ेगी.

न्यूयॉर्क में एक संवाददाता सम्मेलन में आईएसी की समीक्षा समिति के अध्यक्ष हैरॉल्ड शापिरो ने कहा है कि आईपीसीसी को जनता की निगरानी में रखने से उसकी सफलता के क्रम को जारी रखने में सहायता मिलेगी.

आईपीसीसी के मौजूदा अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र पचौरी हैं.

पचौरी 2002 में आईपीसीसी के अध्यक्ष बने और 2008 में उन्हें अपने दूसरे कार्यकाल के लिए चुना गया.

जब उनसे पूछा गया कि यदि ज़रुरत हुई तो क्या वे अपने पद से इस्तीफ़ा देने को तैयार हैं, तो डॉ. पचौरी ने पत्रकारों से कहा कि वे आईपीसीसी के हर निर्णय को स्वीकार करेंगे.

लेकिन उन्होंने कहा है कि वे आईपीसीसी में बदलावों में मदद के लिए पद पर बने रहना चाहेंगे.

माना जा रहा है कि आईएसी की रिपोर्ट पर दक्षिण कोरिया के बुसान में 11 से 14 अक्टूबर को आईपीसीसी की होनेवाली बैठक के दौरान विचार होगा.

संबंधित समाचार