शहरी लोगों में संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता ज़्यादा

शहर
Image caption शहरों में संक्रामक रोगों के फैलने की ज्यादा संभावना रहती है

पारंपरिक शहरी क्षेत्रों के लोगों में आनुवांशिक रूप से संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता ज़्यादा होती है.

'यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन' ने एक शोध के दौरान यह देखने की कोशिश की कि कितने लोगों में ऐसा विशेष 'जीन' पाया जाता है जो उन्हें टीबी और कुष्ठ जैसे संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता देता है.

जिन जगहों पर शहरीकरण का एक लंबा इतिहास रहा है वहाँ के लोगों में यह 'जीन' सामान्य रूप से पाया गया. साथ ही इन जगहों में कभी न कभी इन बीमारियों का प्रभाव रहा है.

शोधार्थियों ने इस खोज को 'क्रमिक विकास प्रक्रिया' कहा है.

जब कोई घातक बीमारी फ़ैलती है तो जिनमें संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए आनुवांशिक तत्व मौजूद रहते हैं वे बेहतर ढंग से अपने 'जीन' को आने वाली पीढ़ी में छोड़ जाते हैं.

सैद्धांतिक रूप से शहरों में लोगों के घुलने-मिलने की संभावना ज़्यादा रहती है और वहाँ संक्रामक रोगों से ग्रसित होने का ख़तरा भी ज़्यादा रहता है.

एक लंबे समय काल में ऐतिहासिक रूप से जहाँ इन बीमारियों का ख़तरा ज़्यादा रहा है वहाँ लोगों में प्रतिरोधक 'जीन' के फ़ैलने की संभावना ज़्यादा रहती है.

यूरोप, एशिया और अफ़्रीका के देशों से इकट्ठा किए गए 'डीएनए सैंपल' के विश्लेषण के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं.

भारत, यूरोप और मध्य पूर्व के देशों में ये प्रतिरोधक 'जीन' पाए गए जहाँ शहरीकरण का इतिहास हज़ारों वर्ष पुराना है.

शोध से जुड़े डॉक्टर इया बारनेस ने बताया, " यह क्रमिक विकास की प्रक्रिया का एक बेहतरीन उदाहरण है. "

उनका कहना था कि यह मानव के विकास में शहरों के विकास की भूमिका को दिखाता है.

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