ग्रेफ़ीन पर शोध के लिए नोबेल पुरस्कार

कॉंस्टेंटीन नोवोसेलॉफ़ और आंद्रे गिएम
Image caption भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दो वैज्ञानिकों को दिया गया है

भौतिक-विज्ञान के लिए इस वर्ष का नोबेल पुरस्कार ग्रेफ़ीन पर किए गए शोध के लिए दो वैज्ञानिकों को मिला है.

आंद्रे गिएम और कॉंस्टेंटीन नोवोसेलॉफ़ दोनों इंगलैंड के मैंचैस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक हैं.

ग्रेफ़ीन कार्बन अणुओं से बनी एक महीन चादर है. ये लगभग पूरी तरह से पारदर्शी होने के बावजूद बहुत मज़बूत और बिजली की सुचालक होती है.

इसके इन्ही विशेष गुणों की वजह से इसका कई क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

शोधकर्ताओं ने अपने कई सहयोगियों के साथ मिलकर पहली बार अणु भर मोटाई वाली कार्बन की परतों को ग्रेफ़ाइट की परत से अलग किया.

नोबेल पुरस्कार संस्था के अनुसार इससे आगे चलकर इलैक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में नए नए प्रयोग किए जा सकेंगे और अधिक तीव्र गति के कम्प्यूटरों का निर्माण हो सकेगा.

स्वीडन के स्टॉकहोम शहर में आयोजित समाचार सम्मेलन में पत्रकारों से टेलिफ़ोन के ज़रिए बातचीत करते हुए प्रोफ़ैसर गिएम ने कहा, “मैं बिल्कुल ठीक हूं. चैन से सोया. मुझे नोबेल पुरस्कार पाने की कोई उम्मीद नहीं थी”.

उन्होने कहा कि पुरस्कार की घोषणा से उनके जीवन क्रम में कोई बदलाव नहीं आया है और वो अपने शोध कार्य में लगे रहेंगे.

पुरस्कृत वैज्ञानिक

प्रोफ़ैसर गिएम 51 वर्ष के हैं और डच नागरिक हैं जबकि नोवोसेलॉफ़ 36 वर्ष के हैं जिनके पास ब्रिटेन और रूस दोनों की नागरिकता है. वैसे मूल रूप से दोनों रूसी हैं.

इन दोनों वैज्ञानिकों ने नैदरलैंड्स में साथ साथ काम करना शुरु किया था जिसके बाद वो ब्रिटेन आ गए.

उन्होने मैंचैस्टर विश्वविद्यालय में रहते हुए ग्रेफ़ीन पर अक्टूबर 2004 में अपना शोधपत्र प्रकाशित किया.

डॉ नोवोसेलॉफ़ पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के वैज्ञानिकों में से एक हैं. आमतौर पर ये पुरस्कार दशकों के अनुभव वाले वैज्ञानिकों को मिलता है.

ग्रेफ़ीन की विशेषता

ग्रेफ़ीन एक तरह का कार्बन है. ये कार्बन के अणुओं की एक सपाट परत होती है जो द्विआयामी शहद के छत्ते की तरह बुनी होती है.

बहुत महीन होने के कारण ये लगभग पारदर्शी होती है. बिजली के सुचालक के रूप में यह तांबे जैसा ही काम करती है और ताप के सुचालक के रूप में अन्य तत्वों से बेहतर काम करती है.

ग्रेफ़ीन के असाधारण इलैक्ट्रॉनिक, यांत्रिक और रासायनिक गुणों की वजह से ये अत्यंत तीव्र गति वाले ट्रांज़िस्टर बनाने में काम आ सकता है.

कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रेफ़ीन एक दिन सिलिकॉन की जगह ले सकता है. ट्रांज़िस्टर के निर्माण में अभी सिलिकॉन का प्रयोग होता है.

ग्रेफ़ीन से बहुत मज़बूत, लचीला और टिकाऊ पदार्थ बनाया जा सकता है और पारदर्शी टच स्कीन या सौर सैल में भी इसका उपयोग हो सकता है.

गिएम और नोवोसेलॉफ़ ने पहले ग्रेफ़ीन की महीन परतों को ग्रेफ़ाइट से अलग किया. ग्रेफ़ाइट का प्रयोग पैंसिलों में किया जाता है.

ग्रेफ़ाइट की एक मिलिमीटर मोटी परत में ग्रेफ़ीन की 30 लाख परतें एक के ऊपर एक चढ़ी रहती हैं.

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