'ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा सबसे ज़्यादा'

संयुक्त राष्ट्र में मौसम विज्ञान से जुड़ी संस्था का कहना है कि आधुनिक काल में वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है.

वर्ल्ड मिटियोरॉलॉजिकल ऑर्गेनाइज़ेशन की रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन और नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा औद्योगिक युग की शुरुआत के बाद से सबसे ज़्यादा है. इन गैसों से ही ग्लोबल वार्मिंग होती है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक गैसों की मात्रा घटाने के लिए दुनिया में जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) का इस्तेमाल एकदम बंद करना पड़ेगा.

जीवाश्म ईंधन से बननी वाली ऊर्जा पर आज भी दुनिया बहुत हद तक निर्भर है और आर्थिक मंदी के बावजूद ख़पत काफ़ी ज़्यादा है. ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है.

सबसे ताज़ा आँकड़ें वर्ष 2009 के हैं जिसके मुताबिक वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर रिकॉर्ड मात्रा में है- औद्योगिक युग शुरु होने के बाद से ये मात्रा 38 फ़ीसदी बढ़ी है.

जीवाश्म ईंधन से समस्या

मिथेन की मात्रा भी बढ़ रही है. विश्व मौसम विज्ञान संस्था को चिंता है कि इसकी एक वजह आर्टिक में बढ़ती गर्मी है.

फ़्रीज़िंग प्वाइंट या उससे नीचे तापमान पर रहने वाली मिट्टी पिघल रही है जिससे मिथेन रिलीज़ होती है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि मिथेन के उत्सर्जन में वृद्धि इतनी ज़्यादा है कि ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है.

पिछले साल कोपनहेगन जलवायु सम्मेलन में ये तय हुआ था कि सब देश स्वेच्छा से ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखेंगे.

वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में कमी लानी है तो तुरंत प्रभाव से सभी उत्सर्जन कम करने होंगे यानी जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल बंद करना होगा.

इस बीच तीन अलग-अलग जलवायु शोध संस्थानों ने अपनी रिपोर्टें जारी की हैं जिसमें कहा गया है कि वर्ष 2010 सबसे ज़्यादा गर्म होगा.

ये सारे तथ्य कानकुन में अगले हफ़्ते होने वाले जलवायु सम्मेलन में पेश किए जाएँगे.

बीबीसी संवाददाता के मुताबिक इस सब के बावजूद धारणा यही है कि इस सम्मेलन में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने को लेकर कोई ठोस सहमति नहीं बनेगी.

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