दाइयों की कमी ले रही है शिशुओं की जान

Image caption पांच में से एक बच्चे की पांच साल की उम्र होने से पहले ही मौत हो जाती है

दुनिया भर में क़रीब चार लाख 80 हज़ार महिलाएं बिना विशेषज्ञों की मदद के बच्चे को जन्म देती हैं.

ब्रिटेन की एक चैरिटी संस्था 'सेव द चिल्ड्रेन' के आकलन के अनुसार हर तीन में से एक महिला बिना किसी विशेषज्ञ की मदद के प्रसवपीड़ा से गुज़रती है.

संस्था का कहना है कि दुनियाभर में बच्चे पैदा करवाने वाली महिला या दाइयों की संख्या में 350,000 की कमी है और अगर ये कमी पूरी कर ली जाती है तो एक साल में एक लाख बच्चों की जान बचाई जा सकती है.

संस्था का कहना है कि हर दिन 1000 महिलाएं और 2000 बच्चों की मौत प्रसव के दौरान आने वाली दिक्कतों की वजह से हो जाती है हालांकि इन पर आसानी से क़ाबू पाया जा सकता है.

दाइयों की संख्या में कमी

संस्था ने दुनियाभर के नेताओं से आग्रह किया है कि वे दाइयों और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएं.

'सेव द चिल्ड्रेन' ने दाइयों की संख्या बढा़ने को लेकर अभियान भी शुरु किया है.

उनका कहना है कि ग़रीब देशों में बच्चों की मौत मलेरिया की बजाए पैदाइश के वक़्त ऑक्सीजन की कमी के कारण ज़्यादा होती है.

संस्था का कहना है कि ग़रीब देशों में प्रसव के दौरान प्रशिक्षित सहायक मिलने की संभावना कम होती है जिसकी वजह से प्रसव के वक़्त ही बच्चे की मौत हो जाती है.

अफ़ग़ानिस्तान में बीबीसी के संवाददाता पॉल वुड के अनुसार काबुल में रह रही 35 साल की रोगुल को समय से पहले आठ बच्चे हुए और सभी बच्चों की मौत हो गई.

रोगुल के पास प्रसव के दौरान मदद करने के लिए एक निरक्षर महिला थी जिसने उससे कहा था कि उसका ख़ून तभी रुकेगा जब वे सात धातुओं से बनी एक चैन पानी के ग्लास में हिलाएंगी.

रोगुल का नवां बच्चा समय से हुआ लेकिन वो भी काल का ग्रास बन गया.

उनका कहना था कि जन्म के बाद उनके बच्चे के हाथ-पांव हरे रंग के हो गए और उसकी मौत हो गई.

रोगुल को टेटनस का एक भी टीका नहीं दिया गया था.

प्रशिक्षण की कमी

अपने नौ बच्चे गंवा चुकी रोगुल ने अब दाई का काम सीख लिया है और अब वह तीन गांवों में गर्भवती महिलाओं को साफ़ सफ़ाई, संतुलित आहार, बच्चे के जन्म के तुरंत बाद मां के दूध और अन्य ज़रुरी जानकारियां देती है.

रोगुल का कहना है वह इन जानकारियों और मदद से कई जान बचा पाई है और अब वह भी तीन बेटियों और एक बेटे की मां है.

इथियोपिया में 94 फ़ीसदी महिलाएं बिना किसी प्रशिक्षित सहायता के बच्चों को जन्म देती है तो वहीं ब्रिटेन में ये आंकड़ा एक फ़ीसदी है.

अफ़ग़ानिस्तान में सबसे ज़्यादा शिशु मृत्युदर के मामले सामने आते हैं. वहां हर 1000 नवजात शिशुओं में से 52 बच्चों की मौत हो जाती है.

रिपोर्ट के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में हर 11 महिला में से एक महिला को प्रसव के दौरान आ रही दिक्कतों की वजह से मौत का ख़तरा रहता है.

पांच में से एक बच्चे की पांच साल की उम्र होने से पहले ही मौत हो जाती है.

'सेव द चिल्ड्रेन 'के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जस्टिन फ़ोरसिथ का कहना है कि किसी भी मां को बिना किसी मदद के प्रसव से नहीं गुज़रना चाहिए.

उनका कहना है,''उन्हें यह भी नहीं पता होता कि बच्चे को पैदा होने के बाद कैसे उसे साफ़ कपड़े से पोछा जाए और सांस लेने में मदद करने के लिए किस तरह से उसकी पीठ को रगड़ा जाए. कोई बच्चा मरने के लिए पैदा नहीं होता.''

फ़ोरसिथ ने दुनियाभर के नेताओं से अपनी योजनाओं में स्वास्थ्यकर्मियों को शामिल करने की अपील की है.

उनका कहना है कि, ''दुनियाभर के नेताओं ने पिछले साल ही ऐसा करने की शपथ ली थी. लेकिन अब उन्हें इसे समर्थन देने के लिए दान देना होगा और राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी.''

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