आर्कटिक के ऊपर ओज़ोन को भारी क्षति

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Image caption एंटार्कटिक के ऊपर की ओज़ोन परत के क्षय होने से गहरी चिंता रही है

इस साल ऊपरी वायुमंडल में ज़बरदस्त सर्दी की वजह से आर्कटिक महाद्वीप के ऊपर की ओज़ोन परत को अभूतपूर्व क्षति पहुंची है.

मार्च के महीने के अंत होते होते ओज़ोन की परत 40 प्रतिशत नष्ट हो गई जबकि पिछली बार ये 30 प्रतिशत नष्ट हुई थी.

ये आंकड़े 'विश्व मौसम विज्ञान संगठन' ने वियना में हुई यूरोपीय जियोसाइंसिस यूनियन की सालाना बैठक में रखे.

ओज़ोन की परत हमें त्वचा के कैंसर से बचाती है लेकिन औद्योगिक रसायनों के साथ हुई प्रतिक्रियाओं की वजह से ये नष्ट हो जाती है.

संयुक्त राष्ट्र के मॉंट्रियल प्रोटोकॉल ने इन रसायनों की सीमा तय कर रखी है लेकिन क्योंकि वायुमंडल में ये लम्बे समय तक बने रहते हैं इसलिए इनसे होने वाली क्षति भी दशकों तक चलती रहती है.

जब स्ट्रैटॉसफ़ियर में कड़ी ठंड पड़ती है तो ये विनाशकारी प्रतिक्रियाएं और बढ़ जाती हैं.

हालांकि एंटार्कटिक में तो ऐसा हर साल होता है जिसकी वजह से ओज़ोन की परत में एक विशाल छेद हो गया है लेकिन आर्कटिक की तस्वीर कम स्पष्ट है क्योंकि स्ट्रैटॉसफ़ियर के मौसम का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है.

इस साल सर्दी के मौसम में आर्कटिक क्षेत्र सामान्य से गर्म रहा लेकिन पृथ्वी से 15 से 20 किलोमीटर ऊपर तापमान बहुत गिर गया.

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव माइकिल जरौड का कहना है, "किस साल सर्दी के मौसम में ओज़ोन की परत को कितना नुकसान पहुंचेगा ये मौसम संबंधी परिस्थितियों पर निर्भर करता है".

"इस साल ओज़ोन की परत को हुआ नुकसान दिखाता है कि हमें सतर्क रहना होगा और आने वाले सालों में आर्कटिक की स्थिति पर नज़र रखनी पड़ेगी".

ओज़ोन की परत के नष्ट होने से सूर्य की नुकसान पहुंचाने वाली पराबैंगनी बी किरणें वायुमंडल से होकर हम तक पहुंच जाती हैं. जिनसे त्वचा का कैंसर और मोतियाबिंद का ख़तरा बढ़ जाता है और ये हमारे शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को नुकसान पहुंचती हैं.

वर्ष 1987 में मॉंट्रिअल प्रोटोकॉल में सहमति हुई थी कि ओज़ोन को क्षति पहुंचाने वाले रसायनों का प्रयोग धीरे धीरे ख़त्म कर दिया जाएगा. इनमें क्लोरोफ़्लोरोकार्बन थे जिन्हे सीएफ़सी कहा जाता है जिनका रैफ़्रिजरेशन में व्यापक प्रयोग होता था.

इनमें से कुछ रसायनों का प्रयोग अब भी कुछ विकासशील देशों में हो रहा है लेकिन बहुत कम स्तर पर.

हालांकि वायुमंडल में इन रसायनों का जमाव घट रहा है लेकिन क्योंकि ये कई दशकों तक बने रहते हैं इसलिए ये माना जाता है कि एंटार्कटिक के ऊपर की ओज़ोन परत का छेद 2045 से लेकर 2060 तक जाकर ही भर पाएगा.

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