'एंटीबायोटिक जानलेवा हो सकते हैं'

Image caption एंटीबायोटिक के ग़लत इस्तेमाल से लाखों लोगों पर जान का ख़तरा पैदा हो गया है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में एंटीबायोटिक दवाओं के दुरूपयोग से बहुत बड़ी तादाद में लोगों पर जान का ख़तरा पैदा हो गया है.

एंटीबायोटिक के दुरूपयोग के ख़तरों के बारे में बताते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन की डॉ नाता मेनाब्दे ने कहा है कि इसके कारण बड़ी तादाद में प्रथम पंक्ति की दवाइयां असर करना बंद कर रही हैं.

मेनाब्दे के अनुसार दूसरी और तीसरी पंक्ति की दवाइयां न केवल बहुत ज़्यादा महंगी होती बल्कि उनके दुष्प्रभाव भी और ज़्यादा होते हैं.

डॉ मेनाब्दे का कहना है, "वो लोग जिन पर बहुत सारी दवाइयां बेअसर हो चुकी हैं वो अपनी बीमारियों के जीवाणु फैलाते हैं. इससे उनके संपर्क में आने वाले लोग भी उन विषाणुओं से ग्रस्त हो जाते हैं और उनपर भी दवाओं का असर नहीं होता. इसके कारण भारत पर छूत की बीमारियों का बहुत बड़ा बोझ तैयार हो गया है."

डरावने उदाहरण

भारत में बुरे हालत के उदहारण देते हुए डॉ मेनाब्दे कहती हैं, " हमारे सीमित अध्ययन के ज़रिये हमें पता लगा है की भारत में हर साल एक लाख ऐसे टीबी के मरीज़ बढ़ रहे हैं जिनपर टीबी की सामान्य दवाइयों का असर नहीं होता. टीबी के इस प्रकार से निपटने में जो दवाएं इस्तेमाल होती हैं वो सामान्य दवाओं से 100 गुना ज़्यादा महंगी हैं और वो पूरी तरह असरकारी भी नहीं हैं. तो ये लोग न केवल खुद घातक रूप से बीमार हैं बल्कि बीमारी को बढ़ा भी रहे हैं."

इसी तरह का एक दूसरा उदहारण देते हुए डॉ मेनाब्दे कहती हैं, " थाईलैंड-कंबोडिया की सीमा पर एक मलेरिया का जीवाणु है जिसने दवाओं के खिलाफ़ प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर ली है. हालाँकि ये जीवाणु अभी तक भारत में नहीं देखा गया है लेकिन आज के मुक्त व्यापार और आवाजाही के ज़माने में अगर ये भारत आ गया तो फिर भारत के पास इसका कोई इलाज नहीं होगा."

`डॉक्टर भी ज़िम्मेदार'

डॉ मेनाब्दे के अनुसार इसके लिए आम लोग तो ज़िम्मेदार है पर डॉक्टर और ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं.

स्थिति के ख़राब होने में डॉक्टरों के योगदान के बारे में डॉ मेनाब्दे साफ कहती हैं," बहुत बार डॉक्टर दवा उद्योग कंपनियों के दबाव में भी एंटीबायोटिक लिख देते हैं. ये कंपनियां ज़रूरी नहीं कि अपनी बनाई दवा को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह से नैतिक तरीकों से ही विज्ञापन करें. ज़रुरत से ज़्यादा एंटीबायोटिक की सलाह देने के मामलों को अगर देखें तो ये देखना पड़ेगा कि किस किस डॉक्टर का किस कंपनी से नाता है."

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ वीएन कटोच मानते हैं कि मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के मामलों में आई तेज़ी के लिए डॉक्टर काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं.

डॉ कटोच ने कहा कि हालात अब सुधर रहे हैं और टीबी के मामले पहले हुई गलतियों के कारण बढ़े हैं.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, " डॉक्टर तो ज़िम्मेदार थे ही. उन्होंने अनाप शनाप ढंग से दवाएं इस्तेमाल की पर डाक्टरों को विकल्प ही पता नहीं थे. डॉक्टरों के ऊपर अंकुश हो ये बहुत ज़रूरी है."

नीम हकीमी

डॉक्टर कटोच के अनुसार डॉक्टरों को समझाया जा रहा है लेकिन वो कहते हैं कि हालात से निपटने के लिए लोगों को भी चेतना होगा.

डॉ कटोच और और डॉ मेनाब्दे इस बात पर एकमत हैं कि लोगों को बिना पूछे एंटीबायोटिक खाना बंद करना होगा. साथ ही महज़ दवा विक्रेता से उसकी पसंद की दवा लेना भी बंद करना होगा.

विश्व स्वस्थ्य संगठन के दिल्ली में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार दिल्ली में 47 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अगर सामान्य ज़ुकाम के लिए उनका डॉक्टर उनको एंटीबायोटिक नहीं लिखता तो वो डॉक्टर बदल देंगे.

ऐसे लोगों की तादाद 53 प्रतिशत थी जिन्होंने माना कि बीमार होने पर वो खुद एंटीबायोटिक ले लेते हैं और अपने परिवार वालों को भी देते हैं.

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