अंधेरी दुनिया में उजाले की किरण

रेटिना

जापान के वैज्ञानिकों ने पहली बार स्टेम सेल यानि मूल कोशिका से आंखों की रेटिना की कोशिकाओं को विकसित करने में सफलता हासिल की है.

‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित लेख में जापानी शोधकर्ताओं ने कहा है कि सिद्घांत के हिसाब से ये तकनीक न देख सकने वाले लोगों के लिए काफ़ी कारगर साबित हो सकती है.

इस तकनीक से प्रयोगशाला में विकसित किए गये रेटिना का प्रत्यारोपण कर नेत्रहीन लोगों की रोशनी लौटाई जा सकती है.

बीबीसी के विज्ञान संवाददाता पल्लव घोष का कहना है, "हांलाकि शोधकर्ता इससे पहले भ्रूण कोशिका से तंत्रिका , मांस पेशी प्रयोगशाला में सफलतापूर्वक बना चुके हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब जापान के वैज्ञानिकों ने रेटिना जैसी जटिल कोशिकीय संरचना बनाई है."

जापानी वैज्ञानिकों की इस नई खोज से दृष्टि गवां चुके मरीज़ों को काफी फायदा हो सकता है.

प्रोफेसर रॉबिन अली , युनिवर्सिटी कालेज, लंदन

दरअसल आँख के पीछे का पर्दा यानी रेटिना कोशिकाओं का समूह है जिसकी वजह से ही हमें दिखाई देता है. दृष्टिहीनता के अधिकतर मामलों में देखा गया है कि रेटिना की यही कोशिकाऐं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं.

आशा की किरण

इस नए शोध पर लंदन के प्रोफेसर रॉबिन अली का कहना है कि जापानी वैज्ञानिकों की इस नई खोज से दृष्टि गवां चुके मरीज़ों को काफी फायदा हो सकता है.

हालांकि मानव की मूल कोशिका से रेटिना की बहुकोशिकाओं को विकसित करने का प्रयोग सफल रहा है, लेकिन इसे मरीज़ों में प्रत्यारोपित करने से पहले इस दिशा में काफ़ी काम करना होगा.

शुरुआती संकेत अच्छे हैं पर अभी इस क्षेत्र में और शोध की ज़रुरत है. विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर सब कुछ ठीक रहा तो पाँच सालों में छोटे स्तर पर चिकित्सीय परीक्षण शुरु हो सकते हैं .

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