लांसेट के शोध पर भारत भड़का

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Image caption दिल्ली के नल से आने वाले पानी घातक बैक्टीरिया से संक्रमित हो सकता है

भारत सरकार ने पुरज़ोर तरीक़े से ब्रितानी वैज्ञानिक शोध पत्रिका 'द लांसेट इंफेक्शस डीज़िज़ेज' की खोज पर प्रश्नचिन्ह लगते हुए कहा है कि इस शोध के "अच्छे उद्देश्य नहीं हैं."

भारत सरकार का स्वास्थ्य विभाग गुरूवार को लांसेट पत्रिका में छपे शोध के बाद फ़ौरन हरकत में आ गया गया.

मंत्रालय से जुड़े आला अधिकारियों ने एक पत्रकार वार्ता कर इस बात का पुरज़ोर खंडन किया कि दिल्ली के पानी या वातावरण के जो बैक्टीरिया मौजूद हैं वो मानवीय स्वास्थ्य के लिए ज़्यादा ख़तरनाक हैं.

भारतीय स्वास्थ्य अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉक्टर वीएम कटोच ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, "इन लोगों ने अपने पिछले पेपर लिखा था कि भारत एक ख़तरनाक जगह है मत जाओ. जबकि इस बात के कोई सबूत नहीं थे. अब इस बार ये दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि ये बैक्टीरिया इस वातावरण में है."

डॉक्टर कटोच के आगे कहा, "वो ग़ैरवाजिब ढंग से ये साबित करना चाहते हैं कि इस देश का वातावरण ख़राब है. पहले कहा कि अस्पताल ख़राब हैं, इलाज ना करों. अब कह रहे हैं कि यहाँ के वातावरण से बैक्टीरिया फैलते हैं. टूरिस्ट आएगा तो ये उसके पेट में घुस जाएगा और वो घर जा कर बीमार हो जाएगा. एक देश को ख़तरनाक जगह बताना अच्छे उद्देश्य नहीं हैं."

'दिल्ली ख़तरनाक'

लांसेट पत्रिका में छपे शोध के अनुसार शोधकर्ताओं ने दिल्ली भर से पानी के नमूने लिए और उसकी जाँच की. इसमें सार्वजनिक नलों से भी पानी लिए गए और जगह-जगह जमा गंदे पानी के भी नमूने लिए गए.

शोधकर्ताओं ने पाया कि चार प्रतिशत नल के पानी में और 30 प्रतिशत गंदे पानी के बैक्टीरिया में एनडीएम-1 जीन थे. ये वही जीन है जो व्यापक रुप से इस्तेमाल में लाए जाने वाले एंटीबायोटिक्स का प्रतिरोध पैदा करता है. इसमें ऐसे बैक्टीरिया भी पाए गए जो हैज़ा और दस्त की बीमारी पैदा करते हैं.

बीबीसी के विज्ञान संवाददाता नील बाउडलर का कहना है कि शोधकर्ताओं ने इसके लिए पानी की अपर्याप्त सफ़ाई और पानी में गंदे पानी के मिश्रण को ज़िम्मेदार ठहराया है.

कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी के डॉक्टर मार्क टोलेमॉन का कहना है कि दिल्लीवासी अनावश्यक ख़तरे का सामना कर रहे हैं.

उनका कहना है, "जो लोग भी दिल्ली के पानी पी रहे हैं या इस पानी में पके भोजन को खा रहे हैं उनके शरीर में लगातार बहुत सी दवाओं के लिए प्रतिरोध पैदा करने वाला बैक्टीरिया जा रहा है."

'सबूत कहाँ हैं'

इस शोध के परिणामों से ग़ुस्साए डॉक्टर कटोच ने इस शोध के क़ानूनी और सही होने पर ही सवालिया निशान लगा दिए.

डॉक्टर कटोच ने कहा, "क़ानूनी तौर पर जब भी कोई जैविक पदार्थ ले जाते हैं तब उसके बारे में पहले अनुमति ली जाती है. अब कैसे वो भाई साहब घूमते फिरते आए और नमूने ले गए. किस तरह से उन्होंने लिए. लिए भी या नहीं. हमने तो उन्हें जाते नहीं देखा. ये फ़र्ज़ी भी हो सकता है. बस ये दिखाओ की हमारे एक तिहाई नमूनों में ये उपस्थित है. ये दहशत फैलाने जैसी रिपोर्ट है." एनडीएम-1 जीन का पता पहली बार वर्ष 2008 में लगा था.

तब से अब तक ब्रिटेन के अलावा अमरीका और कनाडा में भी इसका पता चल चुका है. इससे यह चिंता पैदा हुई थी कि भारत में इलाज के लिए आने वाले विदेशियों के भीतर भी यह जीन प्रवेश कर सकता है.

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