'निराशावादी सोचों को नकारता है मस्तिष्क'

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Image caption मस्तिष्क कहता है, "चिंता न करो, सब ठीक होगा."

शोधकर्ताओं का कहना है कि उस कारण का पता चल गया है जिसकी वजह से घोर हताशा के क्षणों में भी लोग आशावादी उम्मीद बरक़रार रख पाते हैं.

विज्ञान की पत्रिका नेचर न्यूरोसाइंस में प्रकाशित एक शोध में कहा गया है कि मस्तिष्क में वो ताक़त है, जिसके ज़रिए वो भविष्य की अच्छी ख़बरों को पढ़ सकता है.

हालांकि कुछ लोगों नकारात्मक भाव को पूरी तरह से नकार देने की ताक़त रखते है और ऐसे लोग सिर्फ़ जीवन के आशावादी पहलुओं को तरजीह देते हैं.

शोधकर्ताओं का कहना है कि आशावाद सेहत के लिए बेहतर है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों का कहना है कि 80 प्रतिशत लोग आशावादी होते हैं, बावजूद इसके के वो ख़ुद के बारे में ऐसा नहीं कहते हैं.

प्रयोग

वैज्ञानिकों ने उनके आशावादी ख़्यालों के लिए 14 लोगों पर प्रयोग किया था. उनके मस्तिष्क का स्कैन भी किया गया था.

इन सभी को अलग तरह की 80 "संभावित बुरी स्थितियों" के बारे में कहकर उनसे उनका नज़िरया लिया गया.

इन स्थितियों में संभावित तलाक़ और कैंसर के हो सकने का ख़तरा शामिल थे.

लोगों से पूछा गया कि ये किस हद तक संभव है. पूछताछ सत्र के ख़त्म होने के बाद, सहभागियों से संभावनाओं का दोबारा आकलन करने को कहा गया.

जब ख़बर बेहतर थी, तो सभी लोगों के मस्तिष्क के अगले हिस्से ने अधिक काम करना शुरू कर दिया.

प्रोसेस

ये हिस्सा ग़लितयों को प्रोसेस करने के काम से ज़ुड़ा हुआ बताया जाता है.

उसके उलट जब ख़बर बुरी थी तो अधिकतर आशावादियों के दिमाग़ के अगले हिस्से में बहुत कम प्रक्रिया हुई, जबकि जो सबसे कम आशावादियों में से उनके दिमाग़ के इस भाग ने तेज़ी से काम किया.

शोध के मुखिया डॉक्टर तालि शरोत कहती हैं, "धूम्रपान से मौत हो सकती है, ये संदेश लोगों तक नहीं पहुंचता, क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें कैंसर होने की संभावना बहुत कम है. हालांकि आम लोगों में तलाक़ की दर 50 प्रतिशत है लेकिन उन्हें नहीं लगता कि उनके मामले में ऐसा हो सकता है. मस्तिष्क में एक मूल तरह का पूर्वाग्रह है."

हालांकि शरोत का कहना है कि इसका निराशाजनक पहलू ये है कि लोग ख़तरों को कम आंकते हैं.

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