'बढ़ती उम्र के लक्षण रोकने की ओर क़दम?'

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Image caption कुछ वैज्ञानिकों ने सचेत भी किया है कि ये शुरुआती शोध के ही परिणाम हैं

अमरीका में शोधकर्ताओं ने ऐसे प्रयोग किए हैं जिनके फलस्वरूप चूहों में झुर्रियां, मांसपेशियों में कमज़ोरी और मोतियाबिंद जैसे बढ़ती उम्र के लक्षण देर से दिखाई दिए और यहाँ तक कि ख़त्म भी हो गए.

वैज्ञानिकों का मानना है कि ये नतीजे आगे चल कर वृद्ध लोगों की देखभाल पर असर डाल सकते हैं.

शोध के नतीजे नेचर पत्रिका में छपे हैं.

इस प्रक्रिया में वृद्धावस्था से जुड़ी कोशिकाओं को शरीर से निकाल दिया जाता है जो विभाजित होना बंद कर देती हैं. लेकिन ऐसी कोशिकाएं उम्र के साथ शरीर में जमा होने लगती है और प्रतिरक्षा प्रणाली यानि इमम्यून सिस्टम इन्हें पूरी तरह बाहर निकाल नहीं पाता है.

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वृद्ध लोगों में ऐसी लगभग 10 प्रतिशत कोशिकाएं होती हैं.

वृद्धावस्था से जुड़ी कोशिकाएँ नष्ट

अमरीका के मेयो क्लिनिक में वैज्ञानिकों ने ऐसी दवा बनाई है जिसने जेनेटिक यानी अनुवांशिक इंजनीयरियंग द्वारा बनाए गए चूहों में वृद्धावस्था से जुड़ी इन कोशिकाओं नष्ट कर दी गईं.

प्रयोग में शोधकर्ताओं ने वृद्धावस्था के तीन लक्ष्णों पर ध्यान दिया-मोतियाबिंद का आना, मांसपेशियों का नष्ट होना और त्वचा के नीचे जमा वसा का ख़त्म होना जिससे त्वचा चिकनी रहती है.

शोधकर्ताओं का कहना था कि चूहों को जब ये दवा दी गई तो उनमें वृद्धावस्था के इन लक्ष्णों के दिखने में 'नाटकीय रूप से देरी' देखी गई.

और जब ये दवा ऐसे चूहों को दी गई जो बूढ़े हो गए थे, उनकी मांसपेशियों में सुधार देखा गया.

एक शोधकर्ता डॉक्टर जेम्स कर्कलैंड का कहना था, "मैंने ऐसा कुछ भी कभी भी नहीं देखा."

इस उपचार का हालांकि उम्र पर कोई असर नहीं देखा गया लेकिन ये इस वजह से भी हो सकता है क्योंकि चूहे अनुवांशिक इंजीनियरिंग द्वारा बनाए गए थे.

अनन्त यौवन ?

जहां तक मनुष्यों में भी वृद्धावस्था के लक्ष्णों को धीमा करने की बात है, तो मनुष्यों में वृद्धावस्था से जुड़ी कोशिकाओं को चूहों की तरह शरीर से बाहर नहीं निकाला जा सकता.

हालांकि एक और शोधकर्ता, डॉक्टर जान वान ड्यूर्सन का मानना है कि युवाओं में तो पहले से ही वृद्धावस्था से जुड़ी कोशिकाएं शरीर से बाहर निकल रही होती हैं.

उनका कहना था, "मैं आशावादी हूं कि इस शोध का वाकई असर होगा. इन कोशिकाओं से छुटकारा पाने के लिए अगर आप अपने इमम्यून सिस्टम को थोड़ा और बेहतर बना सकें, या फिर ऐसी दवाई बनाई जाए जो इन कोशिकाओं पर काम करे, तो मुझे यक़ीन है कि बस इतना ही काफ़ी होगा."

लेकिन अमरीकी मेडिकल रिसर्च काउंसिल के क्लिनिकल साइंसिज़ सेंटर के डॉक्टर जीसस गिल मानते हैं कि ये सिर्फ़ शुरुआती शोध है और इसके नतीजों को लेकर सावधानी बरतने की ज़रूरत है.

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