'भारत को लड़ाई जारी रखनी होगी'

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Image caption क्योटो संधि जल-वायु परिवर्तन रोकने के लिए सभी देशों की ओर से उत्सर्जन कम करने के प्रयासों पर आधारित थी.

दक्षिण अफ़्रीका के डर्बन में चल रहे जलवायु परिवर्तन के सम्मेलन से भारत को अपने हित में कोई सहमति बनने पर बहुत कम उम्मीद है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वो अपनी लड़ाई छोड़ दे.

दो मुद्दे विवाद पैदा कर रहे हैं. वर्ष 1997 में बनाई गई क्योटो संधि अगले वर्ष ख़त्म हो रही है. इस संधि पर हस्ताक्षर करनेवाले देशों को अपना उत्सर्जन कम करना था – विकसित देशों के लिए ये बाध्यकारी था और विकासशील देशों के लिए स्वेच्छापूर्वक.

इस वक्त विकसित देश आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं, लेकिन वो पहले भी जलवायु परिवर्तन की समस्या पर कुछ नहीं करना चाहते थे और अब तो ये इच्छा और प्रबल हो गई है.

इसलिए उत्सर्जन कम करने का सारा बोझ भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे विकासशील देशों पर डाला जा रहा है, जिसके लिए वो तैयार नहीं.

भारत ने मौजूदा संधि के प्रारूप को ही वर्ष 2012 के बाद फिर से लाने की बात कही है. और इस पर विकसित और विकासशील देशों में सहमति नहीं बन पा रही.

दूसरा मुद्दा है ग़रीब और अविकसित देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता.

वर्ष 2009 में कोपनहैगन में हुए सम्मेलन में तय किया गया था कि विकसित देश एक ‘ग्रीन फंड’ बनाएंगे. लेकिन डर्बन में चल रहे सम्मेलन में कई देशों ने फिर विकासशील देशों की ओर इशारा किया है और कहा है कि आर्थिक मंदी के दौर में उनके लिए फंड के लिए धन जुटाना मुश्किल होगा.

दरअसल भारत के पास और कोई विकल्प नहीं है. ऐसे हर मंच पर उसे जाना होगा और हर बार मज़बूती से दुनिया को ये समझाना होगा कि जलवायु परिवर्तन से उसे कितना नुक़सान हो रहा है, और इसका हर्जाना वो नहीं भर सकता.

कौन कर रहा है ज़्यादा उत्सर्जन?

सबसे पहले तो ये जानना ज़रूरी है कि पुरानी समझ, जिसके मुताबिक उत्सर्जन कम करने की ज़्यादा ज़िम्मेदारी विकसित देशों को दी गई थी, उसके हिसाब से भी प्रयास नहीं किए गए हैं.

आंकड़े बताते हैं कि विकसित देशों ने उत्सर्जन कम करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए और उनका प्रदूषण स्तर कम नहीं हुआ है.

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Image caption विकसित और विकाससील देशों में कौनसा समूह ज़्यादा उत्सर्जन पैदा कर रहा है, यही विवाद का केन्द्र-बिन्दु है.

दूसरा सवाल है वर्तमान में अधिकतम उत्सर्जन किन देशों से हो रहा है? इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और चीन जैसे देशों का आर्थिक विकास तेज़ी से हुआ है.

चीन का कुल वार्षिक उत्सर्जन इस व़क्त अमरीका से ज़्यादा है लेकिन अगर इसे प्रति व्यक्ति के स्तर पर देखा जाए तो चीन अमरीका से पीछे ही है.

साथ ही अगर जलवायु में मौजूद अब तक के कुल प्रदूषण को देखा जाए तो उसमें चीन की हिस्सेदारी 10 फीसदी और अमरीका की 30 फीसदी है.

एक सोचे-समझे तरीके से विकसित देश और वहां का मीडिया, उत्सर्जन कम करने की ज़िम्मेदारी विकासशील देशों पर थोपना चाहते हैं.

उत्सर्जन से नुकसान विकासशील देशों को है लेकिन आंकड़ों को ऐसे दिखाया जा रहा है ताकि लगे कि विकासशील देश ही उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं.

भ्रम और भ्रांतियां

ऐसी ख़बरें भी बार-बार सुनने को मिलती हैं कि अविकसित और विकासशील देशों में दरार आ रही है और अविकसित देश भी विकसित देशों की तरह विकासशील देशों से उत्सर्जन कम करने के लिए ज़्यादा कोशिशों की अपेक्षा रखते हैं.

लेकिन ये महज़ ख़बरें ही हैं क्योंकि अविकसित देश भी जानते हैं कि उत्सर्जन के प्रभावों से जुड़े उनके और विकासशील देशों के सरोकार एक से हैं.

हालांकि ये भी सच है कि अविकसित देशों पर अलग-अलग तरह के दबाव हैं, फिर चाहे वो पैसे का हो, मीडिया का, या फिर अपने निजी स्वार्थ का.

हाल ही में जलवायु परिवर्तन पर काम कर रही अंतरराष्ट्रीय संस्था इंटर-गवर्मेन्टल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की रिपोर्ट ने स्पष्ट तौर से दर्शाया है कि बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं की वजह जलवायु परिवर्तन ही है.

लेकिन उस रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. दरअसल पूरी दुनिया जानती है कि यही सच्चाई है, लेकिन कोई कुछ करना नहीं चाहता क्योंकि ये महज़ पर्यावरण का नहीं बल्कि आर्थिक विकास से जुड़ा हुआ मुद्दा है, और विकास के साथ कई और स्वार्थ जुड़ जाते हैं.

इससे पहले भी ऐसी रिपोर्ट्स को झुठलाने की कोशिशें की गई हैं. लेकिन अगर वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की इन चेतावनियों को समय रहते नहीं समझा गया तो ये हमारी आनेवाली नस्लों के लिए बड़ी परेशानियां पैदा कर सकती हैं.

(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य के साथ बातचीत पर आधारित)

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