डर्बन में दक्षिण एशिया है लेकिन सार्क नहीं

सार्क नेता
Image caption सयुंक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में सार्क भाग नहीं ले रहा.

दक्षिण अफ़्रीका के डर्बन शहर में चल रहे संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में अपनी प्रतिबद्धता के बावजूद दक्षिण एशिया एक क्षेत्रीय गुट के रूप में भाग लेने में विफल रहा है.

बीबीसी को मिली जानकारी के अनुसार वैश्विक जलवायु संधि पर सहमति बनाने के लिए हो रही इस बैठक में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ, सार्क, ने भाग लेने के लिए आवेदन भी नहीं दिया.

सार्क के अधिकारियों का कहना था कि संघ ने जलवायु परिवर्तन सम्मेलन जैसे मंचों में एक क्षेत्रीय गुट की तरह काम करने के बारे में हाल के दिनों में घोषणाएं भी की थीं लेकिन इन पर अमल नहीं हुआ है.

हालांकि पिछले दो दशकों में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन जैसे कई सम्मेलन हुए हैं लेकिन सार्क ने 2010 में ही पर्यवेक्षक के रूप में पहली बार हिस्सा लिया. देर से ही सही लेकिन कई लोगों ने इस कदम का स्वागत किया था क्योंकि वैज्ञानिकों के मुताबिक दक्षिण एशिया जलवायु परिवर्तन के लिहाज़ से दुनिया के सबसे कमज़ोर क्षेत्रों में से एक है.

लेकिन सयुंक्त राष्ट्र अधिकारियों ने बताया कि इस साल सार्क ने सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए आवेदन भी नहीं दिया.

फ़िलहाल सार्क के अध्यक्षता मालदीव कर रहा है. मालदीव के पर्यावरण मंत्री मोहम्मद असलम ने इस पूरे मामले को ज़्यादा महत्व न देते हुए कहा, “मैं वापिस जाकर सार्क की महासचिव से पूछुंगा कि उन्होंने किसी प्रतिनिधि को क्यों नहीं भेजा है. ज़ाहिर है कि हम इस मामले की छान-बीन करेंगे.”

मोहम्मद असलम ने आगे कहा, “हम सब यहां अलग-अलग हिस्सा ले रहे हैं. मैं यहाँ हूं, बांग्लादेश के मंत्री यहाँ हैं. मैंने श्रीलंका, भारत और भूटान के मंत्रियों को भी देखा है. मुझे अब तक सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान के मंत्री नहीं दिखाई दिए हैं लेकिन मुझे यक़ीन है कि वे भी यहाँ आए हैं. हां, इतना ज़रूर है कि सार्क सचिवालय से कोई भी यहाँ नहीं आया है.”

अपने-अपने हित

ये सही है कि दक्षिण एशियाई देशों ने अपने-अपने पर्यावरण मंत्री इस सम्मेलन में भेजे हैं लेकिन वे अलग-अलग गुटों में अपने देश के हितों को ध्यान में रखते हुए उनका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

दक्षिण एशिया में भारत जैसी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ ज़्यादातर सबसे कम विकसित देश हैं और इनके अलग-अलग मुद्दे हैं. लेकिन सार्क के कुछ सदस्य देश के अधिकारियों का मानना है कि इन सबके कुछ साझा मुद्दे भी हैं जिनकी सब मिलकर पैरवी कर सकते हैं.

बांग्लादेश की टीम के समन्वयक क़ाज़ी के अहमद कहते हैं, “हम लोग जल प्रबंधन और ऐसे ही कई मुद्दों पर सहमति बना सकते हैं. हालांकि अभी हमारे मंत्री और अधिकारी एक साथ काम नहीं कर रहे हैं. जब तक हम समझौतों सहमति ज्ञापनों पर एक साथ काम नहीं करेंगे, हम ज़मीनी तौर पर कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगें.”

अहमद ये भी कहते हैं कि हालांकि मिलकर काम करने का विचार पर राजनीतिक स्तर पर सार्क की बैठकों में सहमति बन जाती है, लेकिन नौकरशाही तक पहुंचते-पहुंचते बात ख़त्म हो जाती है.

विश्लेषक कहते हैं कि भारत ज्यादातर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के गुट में नज़र आता है जो विकसित देशों के साथ कार्बन उत्सर्जन के विवादित मुद्दे पर आमने-सामने है. इन दोंनो गुटों के मतभेदों से बातचीत में गतिरोध पैदा हो गया है.

भारतीय पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने इस सप्ताह की शुरुआत में ही साफ़ कहा था कि भारत, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका का गुट, बेसिक, विकासशील देशों के समूह, यानी जी 77 और चीन, का हिस्सा है.

और सार्क ऐसे किसी भी समूह का हिस्सा नहीं है.

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