तीन ज़िंदगी, छह ऑपरेशन

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Image caption तीन बच्चों में एक साथ लिवर प्रत्यारोपण करने की प्रक्रिया में बीस घंटे लगे

डॉक्टरों की एक टीम ने एक चुनौतीपूर्ण लिवर प्रत्यारोपण ऑपरेशन किया है.

दिल्ली के नज़दीक गुड़गांव स्थित मेदांता अस्पताल में डॉक्टरों और सर्जनों की एक टीम ने तीन नन्हे बच्चों पर एक साथ लिवर प्रत्यारोपण कर उन्हें नई ज़िंदगी दी.

मेदांता की टीम का दावा है कि ये न सिर्फ़ भारत बल्कि दुनिया की पहली ‘लिवर ट्रांसप्लांट चेन’ है जिसमें एक साथ ‘स्वैप’ और ‘डोमिनो’ लिवर ट्रांसप्लांट किए गए.

मेदांता अस्पताल के चीफ़ लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. एएस सोएन ने स्वैप और डोमिनो ट्रांसप्लांट का फ़र्क बताया, “परिवार में उपयुक्त लिवर डोनर न होने की स्थिति में स्वैप ट्रांसप्लांट में दो परिवार एक-दूसरे के डोनर के लिवर का आदान-प्रदान करते हैं. जबकि डोमिनो ट्रांसप्लांट में एक मरीज़ का लिवर दूसरे मरीज़ में प्रत्यारोपित किया जाता है. ये एमएसयूडी और कुछ और दुर्लभ बीमारियों में किया जाता है.”

तीन वर्षीय तेजश्री रामानाथन, 22 महीने की अंसा मुंशी और एक साल 10 महीने का अनीश ककरू, इन तीनो बच्चों के लिवर ने विभिन्न कारणों से काम करना बंद कर दिया था और इन्हें बचाने का एकमात्र तरीक़ा था लिवर प्रत्यारोपण.

जहां तीन वर्षीय तेजश्री जन्म से ही एक अनुवाशिंक बीमारी, मेपल सिरप यूरीन डिज़ीज़ (एमएसयूडी) से ग्रस्त थी, वहीं अंसा और अनीश बाइलियरी एट्रीशिया के शिकार थे. तीनों की ज़िंदगी बचाने के लिए लिवर प्रत्यारोपण ही उपाय था.

चुनौतियां

अमूमन ऐसे मामलों में मां या बाप में से किसी एक का लिवर बच्चे में लगाया जा सकता है. लेकिन यहां समस्या इसलिए गंभीर थी क्योंकि तेजश्री और अनसा के माता-पिता के लिवर इनके लिए उपयुक्त नहीं था जबकि अनीश के लिए कोई दान देने वाला नहीं था.

मेदांता अस्पताल की चीफ़ पीडियेट्रिक हेपाटोलॉजिस्ट, डॉ. नीलम मोहन, ने बताया, “आरंभिक जांच में पाया गया कि तेजश्री को अंसा के पिता का और अंसा को तेजश्री के पिता का लिवर, स्वैप ट्रांसप्लांट के ज़रिए दिया जा सकता है. और तेजश्री का लिवर, हालांकि उसके लिए बेकार था लेकिन अगर उसे डोमिनो ट्रांसप्लांट के ज़रिए अनीश में प्रत्यारोपित किया जाए, तो तीनों को बचाया जा सकता है.”

डॉ. मोहन ने आगे बताया, “लेकिन ये तभी संभव था जब प्रत्यारोपण की प्रक्रिया तीनो बच्चों पर एक साथ हो क्योंकि हर बच्चे का जीवन एक-दूसरे पर निर्भर था.”

Image caption मूही मुंशी की दो वर्षीय बेटी अंसा की मुश्किल ये थी कि उसके मां-बाप में से किसी का भी लिवर उसके लिए उपयुक्त नहीं था

ऐसे में डॉ. सोएन, डॉ. मोहन और डॉ. विजय वोहरा के नेतृत्व में 25 दिसम्बर 2011 को चालीस से ज़्यादा डॉक्टर और कुल 110 मेडिकल और पैरामेडिकल स्टाफ़ ने सुबह चार बजे ऑपरेशन शुरु किए जो मध्यरात्रि तक चले.

सर्जरी की चुनौतियों और घटनाक्रमों के बारे में डॉ. सोएन ने बताया, “एक लिवर ट्रांसप्लांट अकेला भी बहुत चुनौतीपूर्ण होता है. लेकिन यहां पांच ऑपरेशन इंसानों पर और एक लिवर पर एक साथ किए गए. हमने छह लिवरों के श्रंखलाबद्ध ऑपरेशन की चुनौतियों पर विचार किया, लगातार 20 घंटे छह ऑपरेशन थियेटरों के बीच समन्वय बनाए रखना ज़रूरी था जो पहले कभी नहीं हुआ था. हमने सारी योजना ऐसे बनाई थी जैसे कि रॉकेट लॉन्च किया जाना हो. पहले से ही समय और टीम के हर सदस्य की ज़िम्मेदारी तय की गई.”

डॉ. सोएन का दावा है ये न सिर्फ़ दुनिया का पहला एक साथ स्वैप और डोमिनो लिवर ट्रांसप्लांट है बल्कि ये पहला मौका है जब दुनिया में कहीं भी तीन बच्चों में एक साथ ज़िंदा डोनरों की मदद से प्रत्यारोपण किया गया हो. इतना ही नहीं, डोमिनो प्रक्रिया के ज़रिए लिवर पाने वाला अनीश ककरू दुनिया का सबसे कम उम्र का बच्चा है.

चिंता के पल

एक तरफ़ ऑपरेशन थियेटर के अंदर डॉक्टर बच्चों की ज़िंदगी बचाने की जद्दो-जहद में लगे हुए थे, तो वहीं बाहर इन बच्चों के अभिभावकों के लिए भी ये बीस घंटे किसी इम्तिहान से कम नहीं थे.

Image caption पीएम रामानाथन के लिए बेटी तेजश्री के जन्म से ऑपरेशन होने तक के तीन साल मानसिक और आर्थिक रुप से बहुत तकलीफ़ भरे थे

दो वर्षीय अंसा की मां मूही मुंशी ने कुछ यूं अपना हाल बयां किया, “इतने छोटे बच्चे पर इतनी बड़ी सर्जरी होना, हम बहुत डरे हुए थे. बीस घंटे तक आपका बच्चा ऑपरेशन थियेटर के अंदर हो, मैं बता नहीं सकती ये कितना ख़ौफ़नाक अनुभव था. और फिर मेरे पति का भी ऑपरेशन हो रहा था क्योंकि वो डोनर थे. पिछले दो साल से मेरे परिवार में कोई भी आराम से सो नहीं पाया है.”

एक निजी कंपनी में काम करने वाले गांधीधाम, गुजरात के पी एम रामानाथन कहते हैं कि जिस दिन से उन्हें अपनी बेटी तेजश्री की बीमारी का पता चला था, तब से ऑपरेशन होने तक के तीन साल उनका हर दिन, मानसिक और आर्थिक तौर पर बहुत तकलीफ़ भरा रहा.

रामानाथन की एक और बेटी, 14 साल की साइश्री, मूक-बधिर है. उन्होंने बताया, “आर्थिक रूप से भी मुझे बहुत परेशानी थी. ऐसे में मेरे दोस्तों ने मेरी मदद की और कुछ मैंने अपनी प्रॉपर्टी बेचकर पैसों का इंतज़ाम किया.”

डॉ. नीलम मोहन का कहना है कि ऑपरेशन के बाद पहला हफ़्ता तीनों बच्चों के लिए बहुत चुनौती भरा था. सौभाग्य से प्रत्यारोपित किए गए तीनों लिवर ठीक काम कर रहे हैं और इसमें शामिल पांचों लोगों की हालत में ठीक ढंग से सुधार हो रहा है.

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