भारत में एंफीबियंस की नई प्रजाति की खोज

एफीबियंस की केसिलियंस ग्रुप की चिकिलिडे प्रजाति इमेज कॉपीरइट SD Biju
Image caption चिकिलिडे प्रजाति की मादा कई महीने तक बिना खाए अंडो को सेतती है.

उभयचर प्राणी यानी एंफीबियंस की सबसे रहस्यमय प्रजाति, केसिलियंस, की एक नई फैमिली उत्तरपूर्व भारत में मिली है.

मेंढक, टोड और सैलामैंडर जैसे जानवर एंफीबियंस में शामिल हैं. पाए गए प्राणी देखने में कृमि या कीड़े की तरह लगते हैं और जंगल की मिट्टी में रहते हैं.

इसकी मादा कई महीनों तक बिना कुछ खाए अंडों को सेतती है.

रॉयल सोसाइटी की पत्रिका, प्रोसीडिंग्स बी, में छपे एक लेख के अनुसार वैज्ञानिकों का कहना है कि इन प्राणियों को जनसंख्या बढ़ने और स्लैश-एंड-बर्न यानी जंगल जला कर की जाने वाली खेती से ख़तरा है.

केसिलियंस बहुत मुश्किल से दिखाई देते हैं क्योंकि ये या तो ज़मीन के अंदर रहते हैं या फिर मिट्टी पर पड़ी पत्तियों के कूड़े के नीचे.

उत्तरपूर्व भारत के सभी राज्यों में पांच साल से ज़्यादा, लगभग 250 मिट्टी खोदने के अभियानों के बाद इस फैमिली की खोज हुई.

'रहस्यमयी' प्राणी

अभियान दल के नेता दिल्ली विश्वविद्यालय के एसडी बीजू थे. भारत में एंफीबियंस की कई नई प्रजातियों की खोज के लिए इन्हें फ्रॉगमैन कहा जाता है.

उनका कहना है, "केसिलियंस, जंतुजगत की सबसे रहस्यमयी समूह या ग्रुप है और इनके मिलने के तुरंत बाद ये पहचान करना असंभव होता है कि क्या ये एक नई प्रजाति है या जाति या फिर कोई नई फैमिली."

प्रोफेसर बीजू ने बीबीसी को बताया, "इस प्रजाति की पहचान करने के लिए हमने इसका डीएनए और इसकी बाहरी और आंतरिक मोर्फोलॉजी का अध्य्यन किया."

जांच के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि उन्होंने न केवल एक नई प्रजाति बल्कि अब तक अज्ञात फैमली की खोज की है.

इस प्रजाति को चिकिलिडे नाम दिया गया है जो स्थानीय गारो भाषा पर आधारित है.

इमेज कॉपीरइट SD Biju
Image caption केसिलियंस की नई फैमिली की खोज उत्तरपूर्व भारत में हुई है.

जहाँ मेंढक या सैलामैंडर के हाथ-पांव होते हैं और उनकी त्वचा खुरदुरी होती है, वहीं केसिलियंस के हाथ-पांव नहीं होते और इनकी त्वचा चिकनी होती है.

इन्हें बहुत कम नज़र आता है और इनकी खोपड़ी ज़मीन के अंदर रहने के अनुरूप होती है.

असुरक्षित भविष्य

हालांकि सर्वेक्षण किए गए लगभग एक-चौथाई जगहों में चिकिलिडे पाए गए, लेकिन प्रोफेसर बीजू का मानना है कि इनका भविष्य सुरक्षित नहीं है.

उनका कहना था, "चिकिलिडे हमें न सिर्फ़ जंगल में बल्कि मानव आबादी के काफ़ी नज़दीक मिले. इसलिए इनका संरक्षण करना बहुत चुनौतीपूर्ण है."

कई गांववालों ने इन्हें जहरीले सांप समझ कर मार भी दिया हालांकि इनमें ज़हर नहीं होता.

लेकिन अच्छी बात ये है कि इस क्षेत्र में, एंफीबियंस को होने वाली एक खास तरह की फंगल या फफूंदीय बीमारी, चिट्रीडियोमाइकोसिस, नहीं होती. इस बीमारी की वजह से दुनिया के कई हिस्सों में एंफीबियंस की आबादी तबाह हो गई है.

दुनिया भर में, जंतुजगत में लुप्त होने का सबसे ज़्यादा ख़तरा एंफीबियंस को है.

लेकिन इस ग्रुप में लगातार नई जातियां और प्रजातियों की खोज होती रहती है, हालांकि खोज अधिकतर सघन वर्षावनों में हुई हैं न कि घनी आबादी वाले इलाकों में.

संबंधित समाचार