परमाणु कार्यक्रम पर फुकुशिमा घटना का असर

फुकुशिमा
Image caption फुकुशिमा एक साल बाद

लगभग एक साल पहले फुकुशिमा परमाणु संयंत्र से जब युद्ध के मैदान की तरह धुआं उठा और धमाके हुए तो ऐसा लगा कि शायद इससे परमाणु सपने का अंत हो जाएगा.

आधिकारिक तौर पर इतिहास के सबसे दो खराब परमाणु दुर्घटनाओं में से एक माने जाने वाली इस घटना के कुछ ही हफ्तों बाद जर्मनी ने एलान कर दिया कि वह अपने सभी परमाणु रिएक्टरों को बंद कर देगा.

स्विटजरलैंड ने भी ऐसा ही किया. यहां तक कि सबसे व्यस्त चीन ने नए पावर स्टेशनों को स्वीकृति देने में विलंब किया.

दुनिया भर में ओपिनियन पोलों में पाया गया कि परमाणु बिजली अपनी चमक खो रही है.

ओईसीडी के ओन्यूक्लर एनर्जी एजेंसी के महानिदेशक लूइस एचावरी कहते हैं, ''फुकुशिमा से काफी प्रभाव पड़ा, पहला लोगों के विचारों पर, और फिर तकनीकी तौर पर इसका विश्लेषण करना कि क्या हुआ और इससे क्या सबक लेने चाहिए.''

उन्होंने कहा, ''मुझे भविष्य की योजनाओं पर इसका असर साफ नजर आता है. नए पावर पलांटों पर फैसले लेने मे विलंब हो रहा है. मुझे लगता है कि यह तीन से चार साल तक चलेगा.''

जापान में दो रिएक्टर चालू

दुनिया भर में फुकुशिमा से पहले चालू हुए रिएक्टर अभी भी चल रहे हैं. यहां तक कि जर्मनी ने भी सभी को बंद नहीं किया.

लेकिन जापान में कुल 54 रिएक्टरों में से सिर्फ दो ही चालू हैं.

कुछ को तो हमेशा के लिए बंद कर दिए गए हैं जबकि कुछ और को लेकर अभी अधिकारियों को फैसला करना है कि उन्हें दोबारा से शुरु किया जाए या नहीं.

लेकिन जापान से बाहर, एक साल बाद कैसा भविष्य होगा? क्या फुकुशिमा, परमाणु कहानी पर पूर्ण विराम लगाएगा या फिर सिर्फ थोड़ी देर के लिए ही इस पर विराम लगेगा?

इस मामले में लोगों की राय अलग-अलग है.

इस उघोग द्वारा प्रोत्साहित वर्ड न्यूक्लर ऐसोसिएशन के महानिदेशक जॉन रिच मानते हैं कि इससे थोड़ी रोक लगी है, इससे ज्यादा कुछ नहीं.

उन्होंने कहा, ''फुकुशिमा की घटना ने लोगों के नजरिए को बदल दिया और इसने नीतियां बनाने वालों में डर पैदा कर दिया है.''

एक बात साफ है. फुकुशिमा से पहले ही परमाणु बिजली का असली केंद्र फ्रांस और अमरीका जैसे बड़े उपभोक्ताओं से एशिया की तरफ मुड़ता जा रहा था.

चीन बड़ा खिलाड़ी

दक्षिण कोरिया परमाणु बिजली का बड़ा उपभोक्ता और तकनीक का निर्यातक बन गया है. लेकिन इस क्षेत्र में चीन सही मायनों में बड़ा खिलाड़ी है.

दुनिया भर के निर्माणाधीन 60 रिएक्टरों में से 26 चीन में हैं और कुछ और आने वाले हैं.

परमाणु रिएक्टरों पर नजर रखने वाले कुछ लोग तो चुपचाप चीन की तारीफ करते हैं कि वह कम बजट और कम समय में रिएक्टर बना पाता है. जबकि फ्रांस और फिनलैंड में यूरोपीय परियोजनाओं में विलंब होता रहा है और इन पर लागत भी बढ़ रही है.

हालांकि इस तर्क के कई आलोचक भी हैं.

कम से कम कागजों में ब्रिटेन समेत कई देश परमाणु रिएक्टर बनाने की अपनी योजना को आगे बढ़ा रहे हैं ताकि ग्लोबल वार्मिंग को कम किया जा सके और उर्जा सुरक्षा को बढ़ाया जा सके.

अमरीका में स्थिति

हालांकि पिछले छह महीनों में एक नई चीज देखने को मिली है. फ्रांस ने घोषणा की है कि वो नए परमाणु रिएक्टर बनाने के बजाए पुराने रिएक्टरों की उम्र बढ़ाएगा.

अमरीका में 1978 के बाद से पहली बार इसी साल फरवरी के महीने में दो नए रिएक्टरों को स्वीकृति दी गई. लेकिन यह संख्या उसके लगभग 60 रिएक्टरों के सामने बहुत कम है जिन पर 20 साल की रोक लगाई गई है.

इससे बाकी देशों की योजनाओं पर प्रभाव होना लाजमी है. अगर कम रिएक्टरों का निर्माण होता है तो सीखने के लिए अनुभव कम होगा. कम सीखने की वजह से इनका सस्ता और जल्दी निर्माण भी कठिन होगा.

भारत में विरोध

गौरतलब है कि भारत में तमिलनाडु की कडनकुलम परमाणु परियोजना पिछले दिनों सुर्खियों में रही था.

इसके विरोध के पीछे हाथ होने के संदेह के आधार पर सरकार ने चार गैरसरकारी संस्थाओं (एनजीओ) के खिलाफ मामला दर्ज किया है.

ये कार्रवाई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान के बाद की गई कि विदेशों से समर्थन प्राप्त कुछ गैर सरकारी संगठन प्रदर्शनकारियों की मदद कर रहे हैं.

संबंधित समाचार