नानी बढ़ाती है नवजात का वजन

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Image caption नवजात शिशु की उम्र ज्यादा होना जननी के सेहत के लिए भी ठीक नहीं

वैज्ञानिकों का कहना है कि नवजात शिशु का वजन सीधे नानी के जीन से जुड़ा हो सकता है.

उनका कहना है कि जीन में अंतर होने से बच्चों के वजन में155 ग्राम तक का अतंर हो सकता है.

जीन अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों की मानें तो इस जीन को रोकने की जरूरत है, जिससे बच्चों के वजन में कमी लाई जा सके.

ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया है कि अगर जीन का एक खास अंश मां की तरफ से बच्चे में आया है तो नवजात शिशु का वजन 93 ग्राम अधिक हो सकता है और अगर यही जीन नानी की तरफ आया है तो शिशु 155 ग्राम अधिक वजनी हो सकता है.

इंगलैंड में हुआ है यह शोध

इस शोध पत्र को विस्तार से अमरीकी जर्नल ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स ने छापा है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के प्रोफेसर गुर्डन मूर और उनके सहयोगियों ने तीन अलग-अलग अध्ययनों में 9500 बच्चों और उनकी मां से लिए गए नमूने से एक जीन का पता लगाया है, जिसका नाम पीएचएलडीए 2 है. इन शोधकर्ताओं का मानना है कि आरएस 1 नामक जीन जब शरीर में प्रवेश का करता है, तो वह शारिरिक विकास की उस पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करता है जिस रूप में वह सामान्य स्थिति में शरीर में पहले से काम कर रहा होता है.

प्रोफेसर मूर ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "यह प्रमाणित हो चुका है कि यह जीन शरीर के विकास को प्रभावित कर वजन बढ़ाता है. हमने जीन पीएचएलडीए 2 का पता लगाया है, अगर यह मां की तरफ से शिशु में आता है तो नवजात शिशु का वजन सामान्य से 93 ग्राम बढ़ जाता है और अगर वह नानी की तरफ से आता है तो नवजात शिशु का वजन सामान्य से 155 ग्राम अधिक हो सकता है."

उन्होंने कहा कि शोध में आरएस 1 जीन का अंश 13 फीसदी लोगों में पाया गया जबकि 87 फीसदी लोगों में आरएस 2 जीन के अंश में पाए गए.

प्रोफेसर मूर ने कहा, "आरएस 2 जीन जो सिर्फ मनुष्य में पाया जाता है, वह बच्चों के सामान्य विकास के लिए बेहतर है और नवजात बच्चे की मां की सुरक्षा के लिए भी."

पिता के जीन का असर नहीं

उन्होंने बताया कि चूंकि गर्भ में पल रहे शिशु के जैविक विकास में पिता की कोई भूमिका नहीं होती है, इसलिए उनकी सुरक्षा पर भी कोई असर नहीं पड़ता है.

पीएचएलडीए 2 नामक जीन इस रूप में खास है कि यह पहला जीन है जो मां की तरफ से आकर सक्रिय रहता है जबकि पिता की तरफ से आकर निष्क्रिय हो जाता है.

हालांकि वैज्ञानिक इस बात का पूरी तरह दावा नहीं करते हैं, लेकिन उनका अनुमान है कि अगर गर्भ के शिशु का वजन कम रहता है तो जननी सुरक्षा की संभावना बढ़ जाती है.

न्यूकासल विश्वविद्यालय के डॉ कैरोलिन रेल्टन का कहना है कि हालांकि यह शोध सिर्फ नवजात शिशु के जन्म के आधार पर किया गया है, यह हो सकता है कि इसका परिणाम भविष्य के स्वास्थ्य पर भी असर डालता हो.

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