ऊँचाई से गिरकर भी कैसे बचे बिल्ली

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Image caption बिल्लियाँ मूलतः पेड़ों पर रहनेवाली जीव हैं, इंसानों के साथ उनकी रिहाईश बहुत बाद में हुई

अमरीका में एक बिल्ली एक अपार्टमेंट की 19वीं मंजिल से गिर गई लेकिन उसे कुछ नहीं हुआ, केवल पाँव में चोट आई. इस घटना ने फिर ये सवाल सामने ला दिया - कि बिल्लियाँ कैसे इतनी ऊँचाई से गिरकर बच जाती हैं?

घटना बोस्टन की है, जहाँ शुगर नाम की इस बिल्ली की मालकिन, नर्स ब्रिटनी कर्क ने सुबह-सुबह ये सोचकर खिड़की खोली कि शुगर को थोड़ी ताज़ी हवा मिले. मगर शुगर या तो गिर गई या स्वयं नीचे कूद गई और सीधे नीचे घास वाली ज़मीन पर जा गिरी.

बाद में जानवरों का ख़याल रखनेवाली एक संस्था के लोगों ने शुगर को देखा और उसके शरीर में लगे माइक्रोचिप से उसकी पहचान कर उसे उसकी मालकिन तक पहुँचा दिया.

ये कहानी बाद में बोस्टन के प्रमुख अख़बार - बोस्टन ग्लोब - में छपी.

मगर वैज्ञानिक इस घटना पर चकित नहीं हुए. पशु चिकित्सकों और जीव वैज्ञानिकों का कहना है कि बिल्लियाँ ऊँचे स्थानों से गिरकर भी क्यों बची रहती हैं, इस बारे में भौतिकी, विकासवाद शास्त्र और शरीर विज्ञान के पास पूरा जवाब मौजूद है.

वर्जीनिया टेक विश्वविद्याल में बायोकेमिस्ट जेक सोका कहते हैं,"इस घटना में ऐसी कोई हैरानी वाली बात नहीं. इससे पहले भी बिल्लियों के इस तरह की घटनाओं में जीवित रहने की कई घटनाएँ हुई हैं".

बिल्लियों के ऊँचाई से गिरने के बारे में व्यवस्थित रूप से अध्ययन करना बहुत व्यावहारिक नहीं हो पाता क्योंकि वैज्ञानिक बिल्लियों को इसके लिए जान-बूझकर नहीं गिराना चाहते.

1987 में ऐसा एक अध्ययन हुआ था जिसमें न्यूयॉर्क के एक पशु चिकित्सालय में ऐसी 132 बिल्लियों के बारे में जानकारियाँ एकत्र की गईं जो ऊँची इमारतों से गिर गई थीं.

इनमें 90 प्रतिशत बिल्लियाँ बच गईं जबकि मात्र 37 प्रतिशत को इलाज की ज़रूरत पड़ी. 32वीं मंज़िल से गिरी एक बिल्ली का केवल एक दाँत टूटा और फेफड़े में तकलीफ़ हुई, मगर उसे भी 48 घंटे के बाद छोड़ दिया गया.

शारीरिक बनावट

वैज्ञानिकों का कहना है कि बिल्लियों का शरीर ऐसा बना होता है कि उन्हें ऊँचाई से गिरकर भी कुछ नहीं होता.

दरअसल बिल्लियाँ सतह पर जितनी जगह छेंकती हैं, वो क्षेत्र उनके वज़न के अनुपात में, आपेक्षिक रूप से बहुत बड़ा होता है. इस कारण उनके गिरने पर पड़नेवाला ज़ोर काफ़ी घट जाता है.

किसी चीज़ के गिरने के समय, नीचे पहुँचने पर उसकी अंतिम गति को टर्मिनल वेलोसिटी कहा जाता है. ये नीचे खींचनेवाले गुरूत्व बल और ऊपर धकेलनेवाले हवा के बल का फल होती है.

1987 में हुए अध्ययन में पाया गया कि बिल्लियों के गिरने की टर्मिनल वेलोसिटी इंसानों, घोड़ों या अन्य जीवों से काफ़ी कम होती है.

उदाहरस्वरूप, एक सामान्य आकार की बिल्ली अगर अपने चारों पैरों को फैलाकर गिरती है तो उसकी टर्मिनल वेलोसिटी लगभग 100 किलोमीटर प्रति घंटा होती है.

मगर यदि इसी ऊँचाई से इंसान गिरे तो उसकी टर्मिनल वेलोसिटी 200 किलोमीटर प्रति घंटे के आस-पास होगी.

वैज्ञानिकों का कहना है कि बिल्लियाँ - आर्बोरियल जीव हैं - यानि बंदरों, गिरगिटों आदि की तरह के ऐसे जीव जो कि यदि घरों या शहरी इलाक़ों में ना रहें, तो पेड़ों पर रहा करते हैं.

जीव वैज्ञानिकों का कहना है कि इन जीवों को पता होता है कि वे किसी भी समय गिर सकते हैं. जैसे कभी वे शिकार पर कूदे और उनका अनुमान गलत हो जाए, या फिर कभी कोई टहनी टूट जाए, या कभी हवा का तेज़ झोंका उन्हें गिरा दे.

वैज्ञानिकों के अनुसार इसी कारण समय के साथ-साथ विकासवाद के सिद्धांत के अनुरूप उनका शरीर ऐसा ढल गया है जिससे उन्हें गिरने के बाद भी चोट ना लगे.

उनका कहना है कि बिल्लियाँ स्वाभाविक रूप से तुरंत पता लगा लेती हैं कि कैसे पाँव नीचे रखकर संतुलन बनाया जाए, जबकि इंसानों में अभी ये स्वाभाविक क्रिया विकसित नहीं हो पाई है.

साथ ही, यदि समय रहा, तो बिल्लियाँ अपने शरीर को जिम्मनास्टों, अंतरिक्ष यात्रियों और गोताखोरों की तरह मोड़ ले सकती हैं.

इसके अलावा वो अपनी पूँछ का इस्तेमाल कर भी ऐसी स्थित में आ जाती हैं कि उनके शरीर का भार उनके पैरों पर पड़े.

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