दवाएं बनेंगी 3-डी प्रिंटर से

 शुक्रवार, 20 अप्रैल, 2012 को 11:30 IST तक के समाचार

दवाएं बनाने वाला प्रिंटर तैयार करने की कोशिस

ब्रिटेन के ग्लासगो विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक ऐसा 3-डी प्रिंटर बनाने में जुटे हैं, जिससे दवाएं और अन्य रसायन तैयार किए जा सकते हैं.

शोधकर्ताओं ने 1,250 पाउंड (लगभग एक लाख रुपए) की लागत से एक सिस्टम बनाया है, जिससे कार्बनिक मिश्रण और अकार्बनिक समूह तैयार किए जा सकते हैं. इनमें से कुछ कैंसर के इलाज में इस्तेमाल किए जाते हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि आगे चल कर इससे मरीजों की जरूरत के हिसाब से दवाएं तैयार की जा सकेंगी.

उनका अनुमान है कि पांच साल के भीतर दवा कंपनियां इस तकनीक का इस्तेमाल कर सकेंगी जबकि आम लोगों के पास इस सुविधा को पहुंचने में 20 साल लग सकते हैं.

व्यवस्था

"भविष्य में आप सामान्य तौर पर मिलने वाले रासायनिक खरीद सकते हैं, उन्हें 3डी प्रिंटर में रखेंगे, उन्हें आपस में मिलाने के लिए बटन दबाएंगे, उसे छानेंगे जिसकी व्यवस्था उसी के अंदर होगी. और फिर आपको वह दवा मिलेगी जो डॉक्टर ने आपको लेने के लिए कहा है."

मार्क सिम्स, शोधकर्ता

शोधकर्ता मार्क सिम्स ने बीबीसी को बताया, “हम इसमें दिखा रहे हैं कि आप रासायनिक सामग्रियों को लेकर प्रिंटर में डाल सकते हैं. उसमें फिर प्रतिक्रिया होंगी और आखिर में आपको कुछ अलग मिलेगा. इसके आधार पर हम कह सकते हैं कि भविष्य में आप सामान्य तौर पर मिलने वाले रसायन खरीद सकते हैं, उन्हें 3-डी प्रिंटर में रखेंगे, उन्हें आपस में मिलाने के लिए बटन दबाएंगे, उसे छानेंगे जिसकी व्यवस्था उसी के अंदर होगी. और फिर आपको वह दवा मिलेगी जो डॉक्टर ने आपको लेने के लिए कहा है.”

इस 3-डी प्रिंटिंग के लिए रोबोट से नियंत्रित होने वाली सिरींज इस्तेमाल की गई हैं, जो जेल आधारित “इंक” से प्रिंटिंग ऑबजेक्ट तैयार करती हैं. यह इंक प्रिंटर में डाले गए रसायन और उत्प्रेरकों के मिश्रण से बनती है.

इस अवधारणा के बारे में सबसे पहले सोचने वाले प्रोफेसर ली क्रोनिन कहते हैं, “रसायनशास्त्री आम तौर पर रासायनिक प्रतिक्रिया के लिए कांच की परखनलियों का इस्तेमाल करते हैं. हमने परखनलियों और रासायनिकों की अवधारणा को 3-डी प्रिंटर में व्यवस्थित कर दिया है.”

जानकारों का कहना है कि अगर यह कोशिश सफल रही तो देखभाल में क्रांतिकारी बदलाव आ सकते हैं

वह कहते हैं, “यह एक तरह से परतों वाले केक की तरह है.- आप आखिरी वाली प्रतिक्रिया को सबसे पहले प्रिंट करते हैं और फिर उसके ऊपर दूसरे रसायनों की परत रखते हैं और फिर उसके ऊपर द्रव डालते हैं. वह द्रव पहली परत में जाता है तो वहां नया अणु बनता है और वह फिर अगली परत में जाकर नया अणु तैयार करता है और इस तरह आखिरी परत तक यह प्रकिया चलती है और फिर आपको अपनी वांछित दवा मिल जाती है.”

अगर यह कोशिश कामयाब रहती है तो डॉक्टर और आम लोग अपनी जरूरत के हिसाब से दवाएं तैयार कर पाएंगे.

'नेचर केमिस्ट्री' जरनल में प्रकाशित शोधपत्र के मुताबिक इससे महंगी केमिकल इंजीनियरिंग तकनीक की पहुंच न सिर्फ आम प्रयोगशालाओं और व्यावसायिक रूप से छोटे उद्यमों तक होगी, बल्कि इससे दुनिया भर में स्वास्थ्य देखभाल में भी क्रांतिकारी बदलाव आएंगे.

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