रोबोटिक टाँगों के जरिए लकवे की शिकार फिर मैदान में..

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Image caption क्लेयर पहले पेशेवर घुड़सवार रही हैं

कभी पेशेवर घुड़सवार रही ब्रिटेन की क्लेयर लोमास को छह साल पहले बताया गया था कि अब वो कभी चल नहीं पाएँगी. लेकिन आज वो जोर-शोर से रविवार को हो रहे 42 किलोमीटर वाले लंदन मैराथन में भाग ले रही हैं.

ये संभव हो पाया है रोबोटिक टाँगों की वजह से जिन्होंने क्लेयर की जिंदगी बदल दी है.

रीढ़ की हड्डी में चोट के कारण क्लेयर से कहा गया था कि अब उसे बाकी की जिंदगी व्हीलचेयर पर बितानी होगी. पर वो तो अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, फिर से स्वतंत्र होना चाहती थीं.

पिछले तीन महीनों से वो ‘रोबोटिक वाकिंग सूट’ की मदद से मैराथन के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही हैं. वो दिखाना चाहती हैं कि घुड़सवारी के दिनों वाले खिलाड़ी का उनका जज्बा बरकरार है या नहीं.

रविवार के मैराथन में जहाँ धावक ये दौड़ कुछ घंटों में खत्म करने की कोशिश करेंगे वहीं क्लेयर को पता है कि उसे करीब तीन हफ्ते लगेंगे.

शुरु-शुरु में तो वो दो कदम ही चल पाती थीं. कुछ हफ्ते पहले तक भी क्लेयर केवल 30 कदम तक चल पा रही थीं और मैराथन में दौड़ना असंभव लग रहा था.

लेकिन पहले से ही खेलों से जुड़े होने के कारण क्लेयर को आगे बढ़ते रहने की हिम्मत मिली. यॉर्कशर की एक क्लिनिक में हफ्ते में तीन दिन वो जम कर प्रशिक्षण लेने लगी. अब वो एक सेशन में एक मील तक चल लेती है.

'शरीर को महसूस नहीं कर पाती'

करीब 1.6 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए उसे कम से कम ढाई घंटे लगते हैं. पर क्येलर को उम्मीद है कि समय के साथ उनकी गति तेज हो जाएगी. वो रात को होटल में रुकेंगी और फिर सुबह उसी जगह से आगे दौड़ना शुरु करेंगी.

क्लेयर को चोट 2006 में लगी थी जब वे अपने घोड़े के ठिठकने से गिर गई थीं. इस दुर्घटना में उनकी गर्दन, पीठ और पसलियों में काफी चोट आई और सीने के नीचे वाले हिस्से में लकवा मार गया.

अपने जैसे लोगों की स्थिति पर शोध के दौरान उन्होंने इंटरनेट पर ‘रोबोट लेग्स’ के बारे में पढ़ा. परिवारजनों और दोस्तों की मदद से क्लेयर ने 43000 पाउंड जुटाए और रोबोट लेग्स खरीदीं.

हालांकि इन्हें लगाकर चलना आसान नहीं है, इसके लिए धैर्य, मशक्कत और धीरज की जरूरत होती है.

बिना सहारे के पहले चलने की स्पर्धा

क्लेयर बताती हैं, “बड़ा अजीब लगता है कि आप अपने शरीर को महसूस नहीं कर सकते. मुझे नहीं पता कि मेरे पैर क्या कर रहे हैं. शुरु में यही चुनौती थी कि मैं बिना काँपे अपना संतुलन बनाना सीखूँ.”

सेंसर्स की मदद से क्लेयर चलती और अपनी टाँगों को उठाती हैं. क्लेयर की एक साल की बेटी है. दोनों के बीच मुकाबला है कि बिना सहारे के कौन पहले चलता है.

क्लेयर बताती हैं, “हमारे बीच ये प्रतियोगिता है. अब मेरे बेटी अपने आप से 10 कदम चल पा रही है. मैं भी वैसे ही चलती हूँ.”

उनकी मंशा है कि वो दौड़ से स्पाइनल रिसर्च के लिए 50,000 पाउंड जुटाएँ. ये संस्था लकवे के शिकार लोगों के इलाज के शोध के लिए पैसा देती है.

पूर्व टेनिस खिलाड़ी हेममेन क्लेयर का नैतिक समर्थन कर रहे हैं. क्लेयर कहती हैं कि बहुत से लोग उनसे भी बदतर स्थिति में है पर उन्हें वैसा समर्थन नहीं मिला है जैसा उन्हें मिला है. वो ऐसे लोगों के लिए पैसा जुटाना चाहती हैं.

मैराथन पूरी होने के बाद क्लेयर व्हीलचेयर में वापस बैठेंगी लेकिन उनका कहना है कि छह साल में पहली बार व्हीलचेयर पर बैठना उन्हें खलेगा नहीं.