विद्रोह में आ जाती है प्रजनन की क्षमता

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Image caption विद्रोह के चलते प्रजनन का रास्ता अपना लेती है श्रमिक मक्खी

एक शोध के दौरान पता चला है कि जब मधुमक्खियों के झुंड का नेतृत्व किसी रानी मक्खी से उसकी पुत्री के पास चला जाता है तो श्रमिक मक्खी ये बर्दाश्त नहीं कर पाती है, और नाराजगी में उनका शरीर में खुद प्रजनन करने की क्षमता आ जाती है.

मधुमक्खियों के हर झुंड में प्रजनन करने में सक्षम रानी मधुमक्खी और हजारों नर मक्खियां होती हैं.

रानी मक्खी की बेटियां प्रजनन करने में सक्षम नहीं होतीं और इनका दायित्व रानी मक्खी की सेवा करना होता है. इन्हें श्रमिक मधुमक्खी कहा जाता है.

झुंड में रहना मधुमक्खियों की एक प्राकृतिक प्रवृत्ति है जिसमें रानी मक्खी के नेतृत्व में कुछ मक्खियां नए घोंसले की तलाश करती हैं.

लेकिन एक जगह को छोड़ने से पहले रानी मक्खी ढेर सारे अंडे देकर जाती है. अंडों के इस झुंड में एक रानी मधुमक्खी निकलती है और बाकि श्रमिक मक्खियां होती हैं.

शोधकर्ताओं के मुताबिक पुरानी श्रमिक मधुमक्खियों को अपने से एक पीढ़ी छोटी इस नई रानी मधुमक्खी के लिए काम करना नागवरा होता है. ये विद्रोही बन जाती हैं और उनका शरीर प्रजनन करने लगता है और वे रानी मक्खियों में बदल जाती हैं.

कैसे आ जाती है प्रजनन की क्षमता

वैज्ञानिकों का कहना है कि ये महज व्यवहार में आया परिवर्तन नहीं, बल्कि इसके पीछे श्रमिक मक्खी के भीतर होने वाले वैज्ञानिक कारण हैं.

मक्खियों में होने वाले इन परिवर्तनों का विश्लेषण करने के लिए शोधकर्ताओं की टीम ने मक्खियों की एक कॉलोनी में फूट डाल दी और एक झुंड को रानी मक्खी से अलग कर दिया गया.

शोधकर्ताओं ने पाया कि जब तक एक नई मधुमक्खी रानी के रूप में विकसित होती, श्रमिक मधुमक्खियों में अंडे देने की क्षमता विकसित हो गई.

शोध कार्य का नेतृत्व करनेवाले पोलैंड के जेगीलोनियन विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक प्रोफेसर माइकेल वायशीचोस्की कहते हैं, “ये बिल्कुल सही है, हालांकि वैज्ञानिक रूप से इनमें ये उम्मीद नहीं थी, लेकिन अब समझ आ रहा है कि श्रमिक मधुमक्खी के विकास के दौरान लार्वा में ये संभावना होती है कि उनमें सेवा करने के बजाय विद्रोही प्रवृत्ति जन्म ले ले.”

लेकिन ये विद्रोही प्रवृत्ति नियमित समय तक थी, जैसे ही नई रानी मक्खी ने खुद श्रमिकों को जन्म दे दिया, उनमें खुद विद्रोह को दबाने की प्रवृत्ति आ गई.

प्रोफेसर माइकेल वायशीचोस्की कहते हैं कि इसे देखकर यही लगता है कि जानवरों में भी स्वार्थी प्रवृत्ति पाई जाती है.

पोलैंड के वैज्ञानिकों के इस शोध के निष्कर्षों को विज्ञान पत्रिका 'करेंट बायलॉजी' में प्रकाशित किया गया है.

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