जुपिटर के चांद पर जीवन की खोज

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विस्मयकारी अंतरिक्ष के बारे में जानने की सभी को जिज्ञासा होती है, लेकिन सदियों से चली आ रही इस जिज्ञासा के आयाम बदल चुके है. अंतरिक्षविद अब ये जानने की कोशिश करते है कि फलां ग्रह या चांद में मनुष्यों के रहने की गुंजाइश है या नहीं.

इस ताजा कड़ी में यूरोपियन स्पेस एजेंसी का नाम जुड़ा है जो बृहस्पति ग्रह या जुपिटर के नाम से चिन्हित ग्रह के चंद्रमा में जीवन की खोज के लिए एक अंतरिक्ष यान भेजने की तैयारी कर रहा है. इस परियोजना पर एक अरब यूरो खर्च होने का अनुमान लगाया जा रहा है.

नासा के अंतरिक्ष यान वोयेजर-प्रथम ने साल 1979 में जुपिटर की आवाज रिकॉर्ड की थी जो चिड़ियों की चहचहाहट जैसी थी.

इन आवाज़ों को पैदा करने के लिए विद्युत-चुंबकीय संकेतों को सुने जा पाने वाले रूप में परिवर्तित किया जाता है. अंतरिक्षविदों को जुपिटर और उसके चंद्रमाओं के बारे में जानने के लिए आवाज़ों से काफी मदद मिलती है.

मिशन

अंतरिक्षविद प्रोफेसर एंड्रयू कोट्स पिछले दो सालों से जुपिटर चंद्रमा मिशन या जूस की रूपरेखा पर काम कर रहें है.

उन्होंने कहा, "इस मिशन के तहत खोजी यान को साल 2022 तक अंतरिक्ष में छोड़ा जाना है जिसके बाद वो जुपिटरकी चंद्रमाएं यूरोपा, कलैस्टो और गैनिमीड के पास से होकर गुजरेगा. साल 2032 तक वो गैनिमीड का चक्कर भी लगा लेगा."

इस मिशन को यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने हाल ही में अपनी स्वीकृति दी है. एक अरब यूरो की लागत वाली ये परियोजना यूरोप की सबसे बड़ी अंतरिक्ष परियोजनाओं में ये एक है. कई लोगों के लग सकता है कि परियोजना की लागत आर्थिक संकट में फंसी देशों के लिए काफी अधिक है, लेकिन लंदन के इंपीरियल कॉलेज की प्रोफेसर मिशेल डोहर्टी का मानना है कि इस परियोजना पर एक अरब यूरो की लागत वाजिब है क्योंकि अंतरिक्ष में इस खोज के अच्छे परिणाम मिलने की भी संभावना है.

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Image caption जूपिटर की तीन चंद्रमाओं पर जीवन की खोज के लिए अभियान चलाना अंतरिक्ष मिशन जूस का मुख्य उद्देश्य है.

डोहर्टी ने कहा, "जीवन के लिए पानी जरूरी है. इसलिए हम ऐसी ही जगहों पर जीवन की खोज करते है जहां पानी मिलने की संभावना होती है. गैनिमीड मेरी पसंदीदा चंद्रमा है, क्योकि हमें पता है कि वहां पानी है, वह बड़ा है और वहां की बर्फीली सतह जांच किए जाने की मांग करती है."

जुपिटर के तीन चंद्रमाओं पर जीवन की खोज के लिए अभियान चलाना अंतरिक्ष मिशन जूस का मुख्य उद्देश्य है.

कटौतियां

नासा भी ऐसी ही एक परियोजना शुरू करना चाहती थी लेकिन इसके शुरू होने से पहले ही इसे अमरीकी सरकार की आर्थिक कटौतियों का शिकार होना पड़ा.

लिंकन यूनिवर्सिटी के अंतरिक्ष वैज्ञानिक प्रोफेसर क्रिस राइले के अनुसार इस परियोजना से यूरोप अंतरिक्ष में जीवन की खोज में बाकी दुनिया से आगे निकल जाएगा.

राइले ने कहा, "ये काम हम पूरी मानवता के लिए कर रहे थे. नासा की इस परियोजना को रोका जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों को आगे आकर इस कार्य को संभव बनाना चाहिए."

लेकिन दूरदर्शी विचार रखने वाले लोगों का मानना है कि जुपिटरके चांद या शनि ग्रह मानवों का नया घर बन सकता है.

कोट्स का कहना था, "पांच अरब साल में जब सूर्य लाल होकर फट जाएगा तब पृथ्वी उसकी चपेट में आ जाएगी और संपूर्ण ब्रहमांड गर्म हो जाएगा. ऐसे समय में पानी वाले इन ग्रहों और चंद्रमाओं में जीवन संभव होगा"

वैज्ञानिक मानते है कि अंतरिक्ष में ऐसे ग्रह हो सकते है जहां इंसान रह सकता है. हालांकि पृथ्वी के बाहर जीवन की तलाश कितनी सफल होगी ये तो भविश्य ही बताएगा.

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