फिर दौड़े लकवाग्रस्त चूहे

 शनिवार, 2 जून, 2012 को 08:26 IST तक के समाचार

स्विटजरलैंड में वैज्ञानिकों ने कहा है कि वो रीढ़ की हड्डी की चोट से लकवा के शिकार हुए चूहों को रसायन और विद्युत की मदद से फिर से चला पाने में सफल रहे हैं.

वैज्ञानिकों ने बिजली के माध्यम से चूहों के मस्तिष्क में इस तरह के सिग्नल भेजे जैसा कि दिमाग शरीर को भेजता है जिसके बाद ये चूहे चलने में कामयाब हो गए. अब यही प्रयोग इंसानों पर भी किए जाने की बात हो रही है.

वैज्ञानिकों ने चूहों की रीढ़ की हड्डी की इस तरह से मरम्मत की जिससे उसका सम्पर्क एक बार फिर मस्तिष्क से जुड़ गया.

रीढ़ की हड्डी का संतुलन कायम करने के लिए बिजली के झटके का भी इस्तेमाल किया गया.

ये अध्ययन विज्ञान पत्रिका साइंस में प्रकाशित हुआ है. विशेषज्ञों का कहना है कि ये एक अनूठा अध्ययन है.

वैज्ञानिकों ने आखिर किया क्या

वैज्ञानिकों ने चूहों की रीढ़ की हड्डी दो हिस्सों में काटी. इसकी वजह से मस्तिष्क से चले संदेश उनके पैरों तक नहीं पहुंचे.

"चूहों ने धीरे-धीरे एक-एक, दो-दो कदम चलना सीखा. इसके बाद तो वो दौड़ लगाने लगे. बाधाओं को उछलकर पार करने लगे. चूहों को इस तरह से उछलते-कूदते देखना उम्मीद से परे था."

प्रोफेसर ग्रेगरी कर्टनी

इसके बाद रीढ़ की हड्डी को दोबारा जोड़ने की कोशिश की गई. इसके लिए कुछ रसायनों का इस्तेमाल किया गया और रीढ़ में संतुलन लाने के लिए विद्युत का प्रवाह किया गया.

मुख्य शोधकर्ता, प्रोफेसर ग्रेगरी कर्टनी का कहना है, ''चूहों ने धीरे-धीरे एक-एक, दो-दो कदम चलना सीखा. इसके बाद तो वो दौड़ लगाने लगे. बाधाओं को उछलकर पार करने लगे.''

उन्होंने बीबीसी को बताया, ''चूहों को इस तरह से उछलते-कूदते देखना उम्मीद से परे था.''

लेकिन फिलहाल ये तरीका इंसानों की रीढ़ की हड्डी की मरम्मत के लिए कारगर नहीं है.

हालांकि वर्ष 2011 में अमरीका में ऐसे ही एक व्यक्ति को डॉक्टरों ने दोबारा खड़ा कर दिया था जिसके सीने से नीचे का हिस्सा एक दुर्घटना में लकवाग्रस्त हो गया था.

लॉस एंजिल्स स्थित कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एडगरटन इस ऑपरेशन को अंजाम देने वाली टीम में शामिल थे.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि ये अध्ययन महत्वपूर्ण है और इससे स्पष्ट हो जाता है कि रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन में मस्तिष्क की अहम भूमिका है.

ये सब कुछ आखिर होता कैसे है, ये अभी भी नहीं पता है. प्रोफेसर एडगरटन का अनुमान है कि शायद ऐसा हुआ होगा कि रीढ़ की हड्डी को इस स्तर तक सक्रिय किया गया कि वो हरकत में आ गई और मस्तिष्क से मिले संकेतों ने इसे और बढ़ा दिया.

सिडनी स्थित गार्वन मेडिकल इंस्टीट्यूट के डॉक्टर ब्रिस विसेल कहते हैं कि वो इस शोध से बड़े रोमांचित हैं.

वे कहते हैं, ''इस नये अध्ययन में जो अहम बात कही गई है, वो ये है कि चूहों में दवाओं, कुछ रसायनों और विद्युत के इस्तेमाल से उन्हें चलने लायक बनाया जा सका है.''

वे कहते हैं, ''आधुनिक चिकित्सा विज्ञान वाकई बहुत आगे बढ़ रहा है.''

लेकिन स्पाइनल रिसर्च सेंटर के निदेशक, डॉक्टर मार्क बेकन आगाह करते हैं कि हकीकत में लगी चोटों की मरम्मत ज्यादा जटिल हो सकती है.

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