वैश्विक संसाधनों पर मोटों का भार

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Image caption इस अध्ययन में विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2005 के आंकड़ों को आधार बनाया गया है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनिया भर में मोटापे के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और उसका असर संसाधनों पर उतना ही होगा जितना कि विश्व की जनसंख्या में एक अरब का इजाफा होने पर होगा.

शोधकर्ताओं ने पहली बार पृथ्वी पर रहने वाले सभी इंसानों के वजन की गणना की है, जिसमें कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं.

'लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रोपिकल मेडिसिन' के वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया भर के लोगों में अगर मोटापा बढ़ता रहा तो वो स्थिति आ सकती है कि जिससे लगेगा कि पृथ्वी पर मौजूदा आबादी से एक अरब ज्यादा लोग रह रहे हैं.

इस अध्ययन में विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2005 के आंकड़ों के आधार पर वैश्विक जनसंख्या का वजन 28.7 करोड़ टन बताया गया है.

'बीएमसी पब्लिक हेथ' पत्रिका में प्रकाशित इस शोध का अनुमान है कि 1.5 करोड़ टन वजन इसलिए ज्यादा है क्योंकि लोग अपनी उम्र और कद के हिसाब से अधिक भारी हैं जबकि 35 लाख टन अधिक वजन की वजह मोटापे को बताया गया है.

दुनिया पर दबाव

शोध के मुताबिक सबसे ज्यादा मोटापा अमरीकी लोगों में पाया गया है. उत्तरी अमरीका में दुनिया की आबादी का छह सिर्फ प्रतिशत हिस्सा रहता है लेकिन वो दुनिया में एक तिहाई से भी ज्यादा मोटापे के लिए जिम्मेदार हैं.

वहीं एशिया में दुनिया की 61 प्रतिशत आबादी रहती है और मोटापे की वजह उसके खाते में सिर्फ 13 प्रतिशत वजन आता है.

वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में एक व्यस्क का औसतन वजन 62 किलो पाया है, हालांकि अलग अलग क्षेत्रों में ये औसत तेजी से घटता बढ़ता है. अमरीका में जहां लोगों का औसतन वजन 80.7 किलो था, वहीं एशिया में ये 57.7 किलो था.

रिपोर्ट के लेखकों में से एक प्रोफेसर इयान रॉबर्ट्स का कहना है, "जब लोग पर्यावरण को बनाए रखने की बात करते हैं तो तुंरत उनका ध्यान जनसंख्या पर जाता है. दरअसल बात ये नहीं है कि कितने लोगों को हमें खिलाना है बल्कि देखना ये होगा कि इस ग्रह पर रहने वाले लोग कितना खाते हैं."

कौन सबसे मोटा, कौन सबसे दुबला

वैज्ञानिकों ने अपने अनुमान में दुनिया के सबसे भारी और सबसे दुबले देशों की सूची भी तैयार की है. सबसे भारी भरकम देशों में बेशक सबसे ऊपर अमरीका का नाम है.

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Image caption मोटापे के मामले में अमरीका पूरी दुनिया में अव्वल है.

रॉबर्ट्स ने बीबीसी को बताया, "अगर हर देश में अमरीका की तरह मोटापा हो, तो वजन के हिसाब से ऐसा लगेगा कि दुनिया में एक अरब लोग ज्यादा रह रहे हैं."

दूसरी तरफ सबसे दुबले देशों में इरीट्रिया, वियतनाम और इथोपिया जैसे देश शामिल हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि ये जरूरी नहीं कि जो देश गरीब हैं, वहां रहने वालों का वजन भी कम हो. जापान जैसे देश इस मामले में बाकी देशों के लिए मिसाल बन सकते हैं, जहां गरीबी न होने के बावजूद लोगों का औसत वजन कम है.

दस सबसे मोटे देशों में अमरीका के अलावा कुवैत, क्रोएशिया, कतर और मिस्र के नाम शामिल हैं. रॉबर्ट्स के मुताबिक अरब देशों में वजन इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि वहां कारों और अन्य वाहनों का ज्यादा इस्तेमाल होता है.

वो कहते हैं, "इस फेहरिस्त में बहुत से अरब देशों को देख कर हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि वहां लोग खाते पीते खूब हैं लेकिन चलते फिरते बहुत कम हैं. वे हर जगह गाड़ी से जाते हैं."

शोधकर्ताओं का कहना है कि उनका ये शोध इस बात को समझने में मदद करता है कि बढ़ते वजन से दुनिया भर के संसाधनों किस कदर दबाव है.

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