एक मिनट में हुए 61 सेकेंड

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Image caption कुछ सरकारें और वैज्ञानिक घड़ियों में कथित छेड़छाड़ के सख्त खिलाफ हैं

शनिवार की रात पहले की रातों से एक सेकेंड लंबी बीती.

दरअसल शनिवार को दुनिया भर की इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों में एक सेकेंड बढ़ा दिया गया ताकि वो धरती की परिक्रमा से तालमेल बनाकर रख सकें.

घड़ियों के अविष्कार से पहले लोग वक्त का अंदाजा आकाश में सूर्य के स्थान से लगाते थे.

लेकिन जैसे जैसे विज्ञान का विकास हुआ, ये पता लगा कि सूर्य को एक बार परिक्रमा करने में ठीक 24 घंटे नहीं लगते हैं.

इसका कारण मौसम में बदलाव और भूवर्गीय सक्रियता हैं.

इसका मतलब ये है कि एक निश्चित वक्त के बाद दुनिया भर की घड़ियों में बदलाव की जरूरत होती है.

ये एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे कई कंपनियों और संस्थाओं को असुविधा होती है. इसलिए उन्होंने ऐसा नहीं करने को कहा है. लेकिन इस कदम के समर्थकों का कहना है कि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो ये प्राकृतिक व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करना होगा.

अगर इस एक सेकेंड की बढ़ोत्तरी नहीं होती है तो वक्त नापने वाली हमारी घड़ियों और पृथ्वी की परिक्रमा करने के वक्त के बीच की दूरी बढ़ेगी. और कई दशकों तक अगर सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया, तो दिन में रात का वक्त दिखेगा और रात का दिन में.

कुछ सरकारें और वैज्ञानिक भी घड़ियों में कथित छेड़छाड़ के सख्त खिलाफ हैं. उनका कहना है कि इससे दुनिया भर के कंप्यूटर नेटवर्कों को खतरा हो सकता है.

वक्त नापने के दो अंतरराष्ट्रीय तरीके निर्धारित किए गए हैं. एक है अंतरराष्ट्रीय एटॉमिक टाइम जो दुनिया भर में फैले एटॉमिक घड़ियों पर आधारित हैं और दूसरा यूनिवर्सन टाइम 1 जो ग्रीनविच मीन टाइम का उत्तराधिकारी है जिसमें वक्त का निर्धारण आकाश में सूर्य के स्थान से किया जाता है.

पहले तरीके के मुताबिक अटॉमिक घड़ियों को करीब हर 18 महीनों में सुधार किया जाता है ताकि समय नापने के तरीकों में एक सेकेंड से ज्यादा का फर्क नहीं हो.

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