नास्तिक हिग्स का ईश्वर कण

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कुछ साल पहले जब यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूकलियर रिसर्च ने लार्ज हेड्रॉन कोलाइडर नामक परियोजना की मशीन को चलाया था तो इससे पहले चंद लोग ही ऐसे थे जिन्होंने पीटर हिग्स का नाम सुना था.

लेकिन ईश्वर कण का नाम हिग्स के नाम पर रखे जाने के बाद से लगभग पूरा संसार उनका नाम जानता है.

विडंबना ये है कि प्रोफेसर हिग्स नास्तिक हैं यानि वो ईश्वर की सत्ता में विश्वास नही करते इसीलिए वो अपने नाम पर रखे गए इस कण का नाम ईश्वर कण पुकारे जाने का विरोध करते हैं.

जिस हिग्स बोसोन कण की आज पूरे संसार में चर्चा हो रही है उसका सिद्धांत 1964 में प्रतिपादित किया गया था.

इस बारे में हिग्स ने दो पेपर लिखे. दूसरे पेपर को जर्नल फिजिक्स लैटर्स ने खारिज कर दिया. हिग्स ने कहा कि वो इसे ढंग से समझ ही नही पाए. हालांकि बहुत बाद में ये पेपर एक दूसरे प्रमुख जर्नल में छपा.

क्या है ईश्वरीय कण?

1970 के दशक तक हिग्स का नाम सिद्धांतों पर लिखे गए अकादमिक पेपरों और सम्मेलनों के साथ जुड़ता रहा.

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Image caption स्विटज़रलैंड में वैज्ञानिकों ने जब हिग्स बोसोन कण की घोषणा की तो इस समारोह में 83 साल के पीटर हिग्स भी मौजूद थे.

पीटर हिग्स का जन्म 1929 में न्यूकैसल में हुआ था और उनके पिता बीबीसी में साउंड इंजीनियर थे.

मेधावी छात्र

जब हिग्स का परिवार ब्रिस्टल में रहने लगा तो हिग्स ने कोटहेम ग्रामर स्कूल में खुद को बेहद प्रतिभाशाली छात्र के रुप में सिद्ध कर दिया. पीटर हिग्स ने कई पुरस्कार जीते मगर भौतिक शास्त्र को छोड़कर.

हांलाकि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उनकी स्कूली शिक्षा रुक गई थी लेकिन जल्द ही उन्होंने फिर से पढ़ाई शुरु कर दी.

स्कूली शिक्षा के बाद हिग्स ने लंदन के किंग्स कालेज में भौतिक विज्ञान की पढ़ाई की. उस समय उन्होंने भौतिकी के एक नए विकल्प सैद्धांतिक भौतिकी को चुना.

कभी उनके साथी छात्र रहे युनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड में प्रोफेसर माइकल फिशर याद करते हैं कि किस तरह से उन्होंने इस विषय में पहली बार हुई परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया था.

1950 में हिग्स ने प्रथम श्रेणी ऑनर्स के साथ डिग्री हासिल की. लेक्चरर की नौकरी के लिए उन्होंने किंग्स कालेज में आवेदन किया लेकिन वो नौकरी उन्हें नहीं बल्कि उनके मित्र माइकल फिशर को मिल गई.

लीक से हट कर काम

एक छात्र के रुप में पीटर हिग्स एडिनबर्ग समारोह में हिस्सा लेने गए थे , पर इसी शहर में उन्हें प्यार हो गया. इसी शहर में पीटर हिग्स ने अपने जीवन का सबसे लंबा वक्त गुजारा.

एडिनबरा विश्वविद्यालय में 31 साल के शोधकर्ता के रुप में हिग्स लीक से हट कर काम करते रहे. लेकिन अकादमिक क्षेत्रों के बाहर हिग्स कोई जाना पहचाना नाम नही थे.

सर्न में महाप्रयोग: कहाँ और कैसे?

1964 में ईश्वरीय कण के सिद्धांत के प्रतिपादन ने उन्हें विश्व स्तर पर पहचान दिला दी.

वर्ष 1997 में उन्हें सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में शानदार योगदान के लिए डिरेक मेडल दिया गया. इसी साल यूरोपीय भौतिकी समित ने उच्च ऊर्जा और कणीय ऊर्जा के लिए सम्मानित किया.

वर्ष 2004 में वोल्फ फाउंडेशन ने हिग्स को भौतिक शास्त्र के वोल्फ पुरस्कार से सम्मानित किया. वर्ष 2006 मे हिग्स एडिनबरा विश्वविद्यालय से रिटायर हो गए.

स्विटज़रलैंड में वैज्ञानिकों ने जब हिग्स बोसोन कण की घोषणा की तो इस समारोह में 83 साल के पीटर हिग्स भी मौजूद थे.

पीटर हिग्स ने कहा कि उन्हें यकीन नही था कि उनके जीवन काल में ये संभव हो सकेगा.

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