लाखों कंप्यूटरों में इंटरनेट बंद होने का खतरा

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Image caption कंप्यूटर पर इस वायरस का असर ख़त्म करने के लिए विश्वव्यापी अभियान चलाया गया है

सोमवार को दुनिया के तीन लाख से अधिक कंप्यूटरों पर इंटरनेट ठप हो सकता है क्योंकि अमरीकी जाँच एजेंसी (एफ़बीआई) ऐसे कई सर्वरों को बंद करने जा रही है जिसका इस्तेमाल साइबर चोर कर रहे थे.

इन कंप्यूटरों में से ज़्यादातर अमरीका में हैं. लेकिन इसका एक हिस्सा कई और देशों में भी है जिनमें से भारत एक है.

एफ़बीआई ने नंबवर, 2011 में अपराधियों के एक ऐसे गिरोह को पकड़ा था जो 40 लाख से अधिक कंप्यूटरों में वायरस डाल चुके थे. उसी समय इन सर्वरों का पता चला था.

जिस कंप्यूटर पर भी इन सर्वरों के ज़रिए ये वायरस डाल दिए जाते थे, उसमें कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को जबरदस्ती विज्ञापन देखने पड़ते थे और इसके बदले में गिरोह को पैसा मिलता था.

एफ़बीआई का कहना है कि अभी भी कई कंप्यूटरों पर इस गिरोह की ओर से डाले गए वायरस का असर है.

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समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों ने आश्वासन दिया है कि वे उपभोक्ताओं की सेवा जल्द ही बहाल कर देंगे.

कैसे किया ये सब?

इस गिरोह ने इंटरनेट के ज़रिए कंप्यूटरों पर वायरस डाल दिए जिसकी वजह से कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को ज़बरदस्ती कुछ विज्ञापन दिखाई देने लगे.

इन विज्ञापनों से गिरोह को 1.40 करोड़ डॉलर (लगभग 80 करोड़ रुपए) की कमाई की.

वे ऐसा इसलिए कर सके क्योंकि उन्होंने इंटरनेट में डोमेन नेम लुक-अप नाम की एक कार्यप्रणाली पर कब्ज़ा कर लिया.

डोमेन नेम वो होते हैं जिसका उपयोग एक पते की तरह वेबसाइट करते हैं. उदाहरण के तौर पर bbc.co.uk/hindi/ एक डोमेन नेम है. इसी तरह हर डोमेन नेम किसी न किसी सर्वर से जुडा़ होता है.

जब हम काम करना शुरु करते हैं तो ये डोमेन नेम सर्वर (डीएनएस) के साथ तालमेल करके एक सांख्यिकी कोड में बदल जाता है.

जब भी किसी कंप्यूटर के एड्रेस बार में डोमेन नेम डाला जाता है तो इंटरनेट के ज़रिए कंप्यूटर डीएनएस से उस वेबसाइट को तलाश करता है कि वह किस सर्वर पर उपलब्ध है.

इस गिरोह ने एक वायरस कंप्यूटरों में डाला जिसे डीएनएस चेंजर कहते हैं और इसकी वजह से ये हुआ कि कंप्यूटर का उस डीएनएस से संपर्क बदल गया जिसके पास वह वेबसाइटों का पता तलाश करने के लिए पहुँचता था.

इस गिरोह पर छापे के बाद से इन सर्वरों को कैलिफ़ोर्निया की कंपनी आईएससी की ओर से संचालित किया जा रहा है.

नवंबर से अब तक एफ़बीआई ने कई इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स यानी इंटरनेट की सेवा देने वाली कंपनियों से संपर्क किया है और उनके ज़रिए ऐसे उपभोक्ताओं को सूचना दी है जिनके कंप्यूटर में डीएनएस चेंजर डाल दिया गया है.

वैश्विक सफ़ाई

ये जाँच करने के लिए कि कहीं आपका कंप्यूटर डीएनएस चेंजर से प्रभावित तो नहीं है, कई ऑनलाइन टूल उपलब्ध हैं.

Image caption अपने कंप्यूटर में इस वायरस की उपस्थिति का पता आप ख़ुद लगा सकते हैं

इसका अर्थ ये है कि नवंबर में जब गिरोह का पता चला था तब से अब तक 40 लाख कंप्यूटरों में से बाक़ी सब की सफ़ाई की जा चुकी है और अब सिर्फ़ तीन लाख कंप्यूटर शेष हैं, जिनमें डीएनएस चेंजर का असर बचा हुआ है.

हालांकि इसका सबसे अधिक प्रभाव हालांकि अमरीका में है लेकिन कई और देशों में बड़ी संख्या में इसका प्रभाव देखा गया है.

इनमें इटली, भारत, ब्रिटेन और जर्मनी शामिल हैं.

नौ जुलाई, सोमवार को जब इन सर्वरों को बंद किया जाएगा तो ऐसे कंप्यूटर जिनमें डीएनएस चेंजर का प्रभाव है, उनमें इंटरनेट काम करना बंद कर देगा.

इसका अर्थ ये है कि जब आप कंप्यूटर पर कोई डोमेन नेम डालेंगे तो आपका कंप्यूटर उस पते को तलाश नहीं कर सकेगा.

एफ़-सेक्योर में इंटरनेट की सुरक्षा पर शोध करने वाले श्याँ सुलिवान कहते हैं, "जैसे ही सर्वर बंद होंगे लोगो को एकाएक समझ में नहीं आएगा कि कंप्यूटर पर कुछ चीज़ें काम कर रहीं हैं और कुछ काम क्यों नहीं कर रही हैं."

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि बची हुई मशीनों यानी कंप्यूटरों की सफ़ाई में कुछ वक़्त लगेगा.

हालांकि उनका कहना है कि इसका असर बहुत व्यापक नहीं होगा क्योंकि इन कंप्यूटरों में से बहुत से अब काम में नहीं लाए जा रहे हैं.

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