'भारतीय वायग्रा' का रूप लेती एक फफूंद

कीड़ा जाड़ी
Image caption बीबीसी संवाददाता जोआना जॉली के हाथों में रखा कीड़ा जड़ी

यौन शक्ति बढ़ाने वाली दवा वायग्रा खरीदने के लिए बड़ी रकम देने वालों को अब एक भारत से खुशखबरी मिल सकती है. यहाँ हिमालय में पाई जाने वाली एक तरह के फफूंद को लोग अब 'भारतीय वायग्रा' का नाम दे रहे हैं.

इससे वहाँ की स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी काफी फायदा हो रहा है. मगर इसके कीमती नकदी फसल बन जाने के बाद अब उसे उगाने वालों को खतरों का भी सामना करना पड़ रहा है.

ये एक इस तरह की फफूंद है जो हिमालय के भारतीय क्षेत्र में एक कैटरपिलर या कीड़े पर हमला करती है और उत्तर भारत में इसे कीड़ा जड़ी भी कहा जाता है. वहीं पड़ोसी तिब्बत में इसका नाम यारसागुम्बा है.

ये फफूंद अपने शिकार के अंदर फैल जाती है और उस कीड़े के सिर से बाहर निकलता है. इसके बाद जब मई या जून में बर्फ पिघलती है तो ये जमीन पर दिखाई देती है.

चीन में कीड़ा जड़ी को यौनोत्तेजक दवा के तौर पर देखा जाता है. एथलीट इसका इस्तेमाल प्रदर्शन बेहतर करने के लिए करते हैं और भारतीय हिमालय के गाँव वालों के लिए ये आय का एक साधन बना हुआ है.

व्यापार

पिछले पाँच वर्षों में इन गाँव वालों ने ये फफूंद इकट्ठा करके इसे स्थानीय व्यापारियों को बेचना शुरू कर दिया है. ये बिचौलिये इसके बाद दिल्ली आकर उसे बड़े व्यापारियों को बेच रहे हैं और वहाँ से वो नेपाल और चीन चली जाती है.

ये जब गाँव में बिकती है तो एक फफूंद की कीमत लगभग 150 रुपए तक मिल जाती है जो दिहाड़ी पर काम करने वाले एक मजदूर की दिन भर की कमाई के बराबर होती है.

कुछ लोग तो एक दिन में 40 ऐसे फफूंद इकट्ठे कर ले रहे हैं. इसलिए अब इस तरह के फफूंद की खोज सोने की खान जैसी बनती जा रही है.

पिछले कुछ महीनों से मैं हिमालय के भारतीय क्षेत्र में हूँ और यहाँ के युवाओ तथा सामाजिक परिवर्तन पर अध्ययन कर रहा हूँ. तिब्बत की भारतीय सीमा के पास के बेमनी गाँव में मैं रह रहा हूँ.

इस दौरान मैंने काफी समय गाँव की बदलती अर्थव्यवस्था को समझने में लगाया है और हमारे हर इंटरव्यू में कीड़ा जड़ी काफी अहम रहा है.

इस गाँव के एक मेहनती व्यक्ति प्रेम सिंह को ही लीजिए. 24 साल के प्रेम ने मई के पहले दो हफ़्तों में हिमालय की ऊँचाइयों पर जाकर कीड़ा जड़ी इकट्ठा किया.

वह खुद ही वहाँ गया था और अपने साथ चावल, गेहूँ और दाल बाँधकर ले गया. रास्ते में वह एक गुफा में ठहरा और लगभग पाँच हज़ार फुट की ऊँचाई पर उसने अपना तंबू ताना.

पहले तीन दिन तो उसे कुछ नहीं मिला मगर उसके बाद उसका भाग्य बदला. वह जब बेमनी लौटा तो उसके पास ऐसी 200 फफूंद थी. अब वो इसके जरिए हुई आमदनी से नया घर बना रहा है. स्थानीय पत्थरों से बना उसका घर दोमंजिला होने वाला है.

खतरे

कीड़ा जड़ी से जो पैसा मिल रहा है वो इस गाँव के लिए बड़ी बात है. अब तक इस गाँव के लोग रोजगार की तलाश में गाँव से निकलकर शहरों का रुख कर रहे थे जहाँ उन्हें होटलों में, सेना में और शहर में मौजूद कुछ अन्य नौकरियों में काम मिल रहा था.

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Image caption ये फफूंद कीड़े के अंदर फैलकर उसके सिर से बाहर निकलती है

मगर अब वो प्रक्रिया बदल रही है. 2007 में जब गाँव वालों को इस फफूंद के बारे में पता चला तो अब बड़ी तादाद में लोग गाँव से निकल तो रहे हैं मगर मैदान में बने शहरों की ओर नहीं बल्कि पहाड़ी ऊँचाइयों की ओर.

प्रेम हमें बताता है, "मैं काम की तलाश में दिल्ली क्यों जाऊँ जबकि वहाँ मैं दो साल में किसी होटल में काम करके जितना पैसा कमाउँगा उतना तो सिर्फ दो हफ्ते में मैं यहाँ पा सकता हूँ."

मगर सब कुछ इतना चमकीला भी नहीं है जितना दूर से दिखता है.

कुछ गाँव वाले तो बर्फीले पहाड़ों में हफ्तों गुजारकर भी खाली हाथ ही लौट रहे हैं. कई इस वजह से बीमार हो रहे हैं. ये फफूंद ढूँढ़ने का मतलब है कि आपको आगे झुककर काम करना पड़ता है, बर्फ में पैर धँसे रहते हैं और सामने आप जो ढूँढ़ रहे हैं वो सेब की डंठल से बड़ा नहीं होता.

इतनी ठंड में और ठंडी हवाओं में आपके फेफड़ों में दर्द हो जाता है.

अकसर तो गाँव लौटने वालों को बर्फ की वजह से होने वाले अंधेपन का सामना करना पड़ता है, उनके जोड़ों में दर्द शुरू हो जाता है और साँस लेने में तकलीफ भी. इसकी वजह से पिछले दिनों एक व्यक्ति की तो मौत भी हो गई थी.

एक व्यक्ति बर्फीली खाई में गिर गया और 13 दिन बाद ही गाँव वाले उसे बचा सके. वह ग्लेशियर या हिमनद से गिरते पानी पर ही बचा रहा. वैसे वो व्यक्ति इसके बावजूद इस साल कीड़ा जारी की तलाश में निकला है.

इस बिजनेस में लोग दुश्मनी भी पाल रहे हैं. जहाँ कीड़ा जड़ी बहुतायत में मिलता है उस जगह पर किसका कब्जा हो इसे लेकर दो गाँवों के बीच दुश्मनी हो गई है. ये फफूंद इकट्ठा करने के लिए अब वे बंदूक भी लेकर जाते हैं.

विकल्प

इसमें अन्य खतरे भी हैं जैसे ये फफूंद इकट्ठा करने की अनुमति तो है मगर उसे बेचने की कानूनी अनुमति नहीं है.

दो साल पहले एक व्यक्ति आया जिसने लोगों से वायदा किया कि वो उन्हें कीड़ा जड़ी की बड़ी कीमत दिलाएगा मगर वो सारे फफूंद लेकर गायब हो गया और फिर नहीं लौटा. अब चूँकि कीड़ा जड़ी काला बाजारी का हिस्सा है इसलिए गाँव वाले उसकी शिकायत भी नहीं कर पाए.

पिछले साल एक युवक स्थानीय शहर में जब वो फफूंद बेचने गया तो किसी गाँव वाले ने पुलिस को बता दिया और उस युवक का पूरा माल पुलिस ने जब्त कर लिया. सोचिए उस बेचारे गाँव वाले की व्यथा जिसने लंबे समय तक ठंड में रहकर वो माल इकट्ठा तो किया था मगर उसका कोई फायदा नहीं उठा पाया.

मगर लोग ये खतरा उठाने के लिए तैयार हैं. प्रेम ने हमें बताया, "आपके पास खतरनाक काम हैं या सुरक्षित रखने वाले काम हैं. कीड़ा जड़ी में खतरा है और जाकर मजदूरी करना सुरक्षित है."

इसे देखते हुए गाँव वालों के लिए ये कीड़ा जड़ी इकट्ठा करना फिलहाल तो एक सुरक्षित जुआ लग रहा है.

अरे हाँ, यहाँ ये बता दूँ कि मैंने फिलहाल इसका इस्तेमाल नहीं किया है.

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