करोड़ों साल पहले भी थे ताड़ के पेड़

Image caption नए शोध में पता चला है कि तार के पेड़ पांच करोड़ 30 लाख साल पहले भी था

वैज्ञानिकों को अंटालटिका में ताड़ के पेड़ होने का सबूत मिला है.अंटालटिका में मिले कुछ अवशेषों की जांच में पता चला है कि इन अवशेषों में ताड़ के पेड़ होने के जीवाणु मिले हैं.

अवशेषों के पराग और जीवाणु को देखकर तैयार किए गए प्राकृतिक तस्वीर से अनुमान लगाया गया है कि वहां इयोसेन समय से भी पहले, लगभग पांच करोड़ 30 लाख वर्ष पहले ताड़ के पेड़ उगते थे.

‘स्टडी इन नेचर’ ने अपने शोध में बताया है कि अंटालटिका का तापमान जाड़े में 10 डिग्री सेंटीग्रेड हो जाता होगा जबकि गर्मी में यह 25 डिग्री सेंटीग्रेड पर पहुंच जाता होगा.

ग्रीन हाउस के बारे में बेहतर जानकारी रखने से यह लाभ होगा कि लोगों को अनुमान लगाने में सुविधा होगी कि वर्तमान में कितना कार्बन डाईऑक्साइट (CO2) बढ़ रहा है.

पहले इयोसेन, जिसे आजकल इयोसेन ग्रीनहाउस कहा जाता है, पर आजकल काफी अधिक शोध हो रहा है क्योंकि इससे धरती के तापमान पर पड़ने वाले असर का पता चलता है.

आकलन के दो तरीके

इस शोध के सह लेखक जेम्स बेंडल ने कहा, “इसे देखने के दो तरीके हो सकते हैं कि हम भविष्य में क्या करने जा रहे हैं.”

जेम्स बेंडल ग्लासगो विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, “एक तरीके में भौतिक शास्त्र के आधार पर तैयार किए गए मॉडल को अपनाया जाता हैं जिसमें ‘भविष्य की ओर देखो’ वाली पद्धति अपनाई जाती है. इसमें भूवैज्ञानिक अतीत का आंकलन करते हैं कि अगले 10 वर्षों में हम कहां जाएगें या 20 साल या फिर सैकड़ों वर्षों के बाद हम कहां जाएगें.”

पहले इयोसेन में ग्लोबल तापमान 5 डिग्री ज्यादा होता था और ध्रुव औत विषुवत रेखा के बीच के तापमान में इतना अंतर नहीं था.

हालिया शोध में पता चला है कि उत्तरी ध्रुव पर निश्चित रूप से उष्मकटिबंधीय तापमान रहा होगा.

बर्फ के नीचे

लेकिन अब अंटालटिक एक अलग तरह की चुनौती पेश कर रहा है. तीन लाख 40 हजार वर्ष पहले ग्लैशियर बन जाने से पैदा हुआ अवसाद हजारों- लाखों फिट बर्फ के नीचे दब गया.

अब एकीकृत समुद्र खुदाई योजना (आईओडीपी) उस सतह तक पहुंच गया है, जैसा पहले एयोसेन अंटार्कटिक रहा होगा.

आईओडीपी के तहत नीचे से अवशेष जमा किया गया और ताड़ के पेड़ के पराग को उसी प्रजाति के पेड़ जो आधुनिक समय में बेओबैब और माकादामिया कहलाता है, के साथ मिलाया गया.

महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अवशेष आर्शिया से भी मिलता-जुलता है.

वैज्ञानिकों ने पाया कि जीवाश्म का सेल धरती के तापमान की वजह से उस वक्त सुरक्षित रह गया था.

अगर इसे दूसरे शब्दों में कहा जाय तो कह सकते हैं कि पांच लाख 30 हजार साल पहले जमीन में दफन हुआ थर्मामीटर है.

दोनों डाटा को देखने के बाद पता चलता है कि अंटाकटिक में जाडे़ में भी तापमान दस डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं जाता था और गर्मी में वह तापमान औसतन 20 से 20 डिग्री के के बीच रहता होगा.

इसलिए तटीय तराई के भू-भाग पर ताड़ के पेड़ लगाए गए होगें और बर्फीली जगहों पर लघु पेड़ लगाए गए होगें.

डॉक्टर बेंडल ने कहा कि धरती के वर्तमान आकलन में इयोसेन में अधिक मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइट पाया जाता होगा.

उनके अनुसार, “जैसे-जैसे हमारी जानकारी बढ़ती जाती है तो ऐसा लगता है कि जो मॉडल हम इस्तेमाल करते रहे हैं, यह दर्शाता है कि हम वायुमंडल परिवर्तन का आकलन कई सौ वर्ष अधिक नहीं कर रहे हैं बल्कि हो सकता है कि हम जलवायु परिवर्तन का आकलन कई सौ वर्ष कम कर रहे हों.”

डॉक्टर बेंडल का कहना है कि इयोसेन के परिणाम से निश्चित रूप से हमें लाभ होगा.

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