1976 की एक रात...और एक सपने की शुरुआत

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1976 की एक गुलाबी ठंड भरी रात, टिमटिमाते तारों भरे आसमान को निहारते और बीबीसी रेडियो के ज़रिए मंगल ग्रह पर पहुंचे 'वाइकिंग मिशन' की खबर सुनते हुए 17 वर्ष के माइगुएल सैन मार्टिन के मन में पहली बार अंतरिक्ष विज्ञानी बनने की इच्छा जागी.

अर्जेंटीना के रहने वाले साधारण से युवक सैन मार्टिन की उम्र उस वक्त 17 साल थी और उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि एक दिन वो मंगल ग्रह से जुड़े नासा के एक ऐतहासिक मिशन का हिस्सा बनेंगे. ये मिशन था 1997 का ‘पाथ फाइंडर मिशन’.

मैसेटच्यूसेट्स प्रौद्योगिकी संस्थान से अंतरिक्ष विज्ञान में विशेषज्ञता हासिल करते ही अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी ने मार्टिन को नासा में शामिल कर लिया.

नासा में 27 साल बिताने के बाद सैन मार्टिन के लिए ज़िंदगी का सबसे चुनौतीपूर्ण लम्हा वो होगा जब सोमवार को 5.7 करोड़ किलोमीटर की यात्रा के बाद ‘क्यूरियोसिटी रोवर’ नामक यान मंगल की सतह पर उतरेगा.

Image caption मिशन से जुड़े माइगुएल सैन मार्टिन के लिए यान की सुरक्षित लैंडिंग उनके वैज्ञानिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है.

इस यान के सुरक्षित मंगल ग्रह पर उतरने का ज़िम्मा नासा के ‘मार्स सांइस लैबोरेट्री प्रोजेक्ट’ से जुड़े सैन मार्टिन पर है. ‘क्यूरियोसिटी रोवर’ किस तरह और किस जगह मंगल की सतह पर उतरेगा, इसी से यह तय होगा कि ये मिशन सफल रहा या नहीं.

बेहद खास है ‘क्यूरियोसिटी रोवर’

अंतरिक्ष यान क्यूरियोसिटी रोवर कई मायनों में बेहद खास है. ये न सिर्फ नासा की ओर से बनाया गया अबतक का सबसे भारी और बड़ा अंतरिक्ष यान है बल्कि नासा के दस सबसे विशिष्ट और तकनीक संपन्न अंतरिक्ष उपकरणों को लेकर गया है.

यही नहीं सैन मार्टिन और उनके दल ने अपने हुनर से एक ऐसा साफ्टवेयर तैयार किया है जो पहली बार वैज्ञानिकों की मदद के बिना किसी अंतरिक्ष यान की स्वाचालित ‘लैंडिंग’ कराएगा. अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है.

लॉस एंजेलिस स्थित अपने घर से बीबीसी मुंडो सेवा के साथ बात करते हुए मार्टिन ने कहा, ‘’कुछ लोग कह रहे हैं कि मैं एक जॉय-स्टिक की मदद से उस तरह यान को नियंत्रित करूंगा जैसे हम वीडियो-गेम खेलते हैं. मैं बस यही कह सकता हूं कि इन बातों में सच्चाई का अंशमात्र भी नहीं है.‘’

सच तो ये है कि ‘क्यूरियोसिटी रोवर’ न सिर्फ एक साफट्वेयर के सहारे अपने बल-बूते मंगल-ग्रह की सतह पर उतरेगा बल्कि सैन मार्टिन और उनके सहयोगी यान के उतरने की प्रक्रिया को देख भी नहीं पाएंगे.

उम्मीद और आत्मविश्वास

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Image caption ये मिशन अगर सफल रहा तो वैज्ञानिकों को इस बात की जानकारी मिल पाएगी कि मंगल ग्रह पर क्या कभी जीवन मौजूद था.

भारतीय समयानुसार सुबह के 11:30 बजे ‘क्यूरियोसिटी रोवर’ मंगल की सतह पर उतरेगा और अगले सात मिनट तक वैज्ञानिकों की सांसे ये देखने के लिए अटकी रहेंगी कि यह यान अपने सुरक्षा कवच से निकल कर सही कोण और निश्चित तरीके से मंगल की सतह पर उतरे.

‘क्यूरियोसिटी मिशन’ अगर सफल रहेगा तो अध्ययनों के ज़रिए वैज्ञानिकों को इस बात की सटीक जानकारी मिल पाएगी कि मंगल ग्रह पर क्या कभी जीवन मौजूद था.

‘क्यूरियोसिटी रोवर’ के इस मिशन को हकीकत बनाने के लिए ये ज़रूरी है कि नासा के तकनीकी कक्ष में इससे जुड़ी 76 तकनीकी प्रक्रियाएं सही साबित हों.

तमाम कयासों और मुश्किलों के बावजूद सैन मार्टिन को इस बात का विश्वास है कि ये मिशन कामयाब होगा और ‘क्यूरियोसिटी रोवर’ ठीक उसी तरह उतरेगा जिस तरह मिशन की सफलता के लिए ज़रूरी है.

यहां तक कि उन्होंने एलए नामक उस बार का चुनाव भी कर लिया है जहां वो मिशन कामयाब होने के बाद अपने साथियों और अपनी टीम के साथ जश्न मनाना चाहते हैं.