भारत बनेगा विमान व्यवसाय का केंद्र?

 गुरुवार, 27 सितंबर, 2012 को 13:59 IST तक के समाचार

चालीस साल पहले अपनी शुरूआत करने वाला भारतीय एयरोस्पेस उद्योग अब कर्नाटक में एक बार फिर जीवंत होने की उम्मीद में हैं.

लेकिन क्या ये कामयाबी मौजूदा समय में एक व्यवसाय का शक्ल ले पाएगी?

और ये जानने के लिए मैं पहुंची भारत के सबसे पुरानी और बड़ी एयरक्राफ़्ट निर्माता सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल के मुख्यालय में.

एचएएल की स्थापनी 1940 में सैन्य विमान बनाने के लिए हुई थी. यहां इंजीनियर भारत में तैयार किए जा रहे लड़ाकू हेलीकॉप्टर रुद्र पर काम कर रहे हैं.

ये हेलीकॉप्टर हर मौसम में अपने टार्गेट पर निशाना साध सकेगा और इसमें 70 मिली मीटर के रॉकेट, टैंक-रोधी मिसाइलें और हवा से हवा मार करने वाली मिसाइलें होंगी.

इस हेलीकॉप्टर ने प्रशिक्षण दौरान अपने जौहर दिखा दिए हैं औऱ ये इस साल के अंत में सेना को दे दिया जाएगा. इस पृष्ठभूमि में अब कर्नाटक में एयरोस्पेस उद्योग के लिए एक विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाया जा रहा है.

कर्नाटक पर नज़र

"कर्नाटक में इस व्यवसाय के लिए प्रशिक्षित व्यक्ति हैं. इस धंधे से जुड़े कई सप्लायर भी यहीं हैं. इस वजह से हम सोचते हैं कि कई कंपनियां अपने कारखाने ऐरोस्पेस पार्क में स्थापित करने में दिलचस्पी दिखाएंगी. "

कर्नाटक के निवेश आयुक्त महेश्वर राव

कर्नाटक के निवेश आयुक्त महेश्वर राव कहते हैं, “कर्नाटक में इस व्यवसाय के लिए प्रशिक्षित व्यक्ति हैं. इस धंधे से जुड़े कई सप्लायर भी यहीं हैं. इस वजह से हम सोचते हैं कि कई कंपनियां अपने कारखाने एयरोस्पेस पार्क में स्थापित करने में दिलचस्पी दिखाएंगी. ”

ख़ुद भारत में भी विमानों की ख़ासी मांग है. पिछले वर्ष दुनिया में बिके कुल विमानों में से 15 फ़ीसदी भारत में बेचे गए हैं.

लेकिन अब भारत में सस्ती मरम्मत और नए जहाज़ बनाने का केंद्र बन सकता है. सस्ते मज़दूर की उपलब्धता के अलावा भी कई चीज़ें बैंगलोर के पक्ष में हैं.

यहां भारत के सामरिक प्रतिद्वंद्वियों चीन और पाकिस्तान से दूर कई महत्वपूर्ण सरकारी सैन्य कंपनियां हैं. एचएएल के अलावा नेशनल ऐरोस्पेस लैब, डीआरडीओ और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान भी यहीं हैं.

इन सरकारी कंपनियों की वजह से कर्नाटक में कई इंजीनिरिंग कॉलेज और शोध संस्थान भी पनपे हैं. तो संभावित विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी एसईज़ेड में सरकारी कंपनियों की बहुलता होगी लेकिन निजी कंपनियां इसमें केंद्रीय भूमिका निभाएंगी.

बोइंग, एयरबस, हनीबैल और जीई एविएशन जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां पहले यहां मौजूद हैं. लेकिन भारत में ऐरोस्पेस क्षेत्र में बढ़ती मांग इसके पक्ष में जाएंगी.

स्थानीय कंपनियों को काम

एचएएल हेलीकॉप्टर

भारत के बड़े सैन्य सौदों का फ़ायदा स्थानीय कंपनियों को भी.

भारत इस समय सर्वाधिक सैन्य सामान आयात करने वाला देश है. और हर ख़रीद के समझौते में भारत के भीतर निवेश का प्रावधान भी जुड़ा होता है इसलिए विदेशी कंपनियों का यहां आना ज़रुरी हो जाता है. ये बड़ी कंपनियां भारत की मंझोली और छोटी कंपनियों के साथ पार्टनरशिप करती हैं.

मसलन साल 2009 में भारत ने बोइंग से आठ पी-81 नेवी हवाई जहाज़ ख़रीदे थे. इस ख़रीद की पहले खेप 2013 में होगी. लेकिन इसके लाभ पहले से ही देखे जा सकते हैं.

समझौते के तहत इस एयरक्राफ़्ट से जुड़े साज़ो-सामान की कुछ मात्रा का निर्माण में भारत होना था और वो हो भी रहा है. बीएएस पी-81 के लिए डैटा लिंक तैयार कर रहा है. एवनटेल नाम की कंपनी मोबाइल सैटेलाइट सिस्टम तैयार कर रही है. साथ ही एचएएल, ईसीआईएल, डीटीएल और टाटा एडवांस मैटेरियल लिमिटेड भी पी-81 से जुड़ा कोई न कोई काम कर रहे हैं.

ऐसी ही एक कंपनी के सीईओ उदयंत मल्होत्रा बताते हैं, “हमें गुणवत्ता का बहुत ख़्याल रखना पड़ता है और इसके ऐसे कर्मचारी चाहिए जो अपने काम में माहिर हों.”

ऐसी कंपनियां के लिए दुनिया की बड़ी ऐरोस्पेस कंपनियों से मिलने वाले काम के अवसर लगातार बढ़ते जा रहे हैं.

एचएएल का तेजस

ऐरोस्पेस इंजीनियर

ऐरोस्पेस कंपनियं को भारत में सस्ते कर्मचारी मिल सकते हैं और साथ ही स्थानीय मांग भी बढ़ सकती है.

लेकिन भारत के भीतर भी एचएएल पूर्णतया स्वेदशी तकनीक के सहारे तैयार किए जाने वाले विमानों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है. जैसे कि इंटरमीडिएट जेट ट्रेनर्स यानी आईजेटी विमान जल्द ही वायुसेना को सौंपा जा सकता है.

नए पॉयलट ऐसे ही जहाज पर प्रशिक्षण लेते हैं.

वर्तमान में वायुसेना के पॉयलट ‘किरन एमके-1 जेट ट्रेनर’ पर शुरूआती प्रशिक्षण लेते हैं लेकिन ये दूसरे स्तर के ट्रेनर विमान हैं क्योंकि पहले स्तर के ट्रेनर विमान हिंदुस्तान पिस्टन ट्रैनर-32 को 2009 में उड़ाना बंद कर दिया गया था.

अब साल 2015 में किरन विमान का भी उड़ना भी बंद हो जाएगा.

आने वाले एचएएल के लिए ख़ासे अहम होने वाले हैं क्योंकि इस सरकारी कंपनी को अपना महत्वाकांक्षी लड़ाकू विमान तेजस का प्रोजेक्ट पूरा करना है. तेजस मिग-21 की जगह लेगा.

जो भी हो लेकिन एक अनुमान के अनुसार भारत के विमानन उद्योग का 75 फ़ीसदी हिस्सा तो आने वाले सालों में कर्नाटक से ही आएगा.

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