कम रोशनी में पढाई करें या नहीं?

Image caption अगर आप कम रोशनी में किताब पढ़ते हैं तो आपकी आंखें उस स्थिति में भी खुद को ढाल लेती हैं

अगर आपको कभी कम रोशनी में पढ़ते हुए आपके माता-पिता ने पकड़ा है, तो उन्होंने ज़रूर आपको ये हिदायत दी होगी कि कम रोशनी में पढ़ने से आपकी आंखें ख़राब हो जाएंगीं.

लेकिन इंटरनेट पर थोड़ी सी रिसर्च कीजिए और आप पाएंगें कि ये सिर्फ़ एक मिथक है कि कम रोशनी में पढ़ने से आंखों पर बुरा असर पड़ता है.

पर ये मसला यहीं ख़त्म नहीं हो जाता. थोड़ा और गहराई में जाएं और वैज्ञानिक तथ्यों को जानें तो ये मामला सुलझने के बजाय और पेचीदा हो जाता है.

इस पहेली में उलझने से पहले आइए हम आंखों की रोशनी से जुड़ी मूलभूत बातों के बारे में जान लेते हैं.

हमारी आंखों की संरचना बेहद अनोखी होता है. दरअसल हमारी आंखें अलग-अलग रोशनी के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेती हैं.

नज़रों का खेल

अगर आप कम रोशनी में पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, तो आपकी आंखों की पुतलियां फैल जाती हैं ताकि लेंस के ज़रिए आपके रेटिना में ज़्यादा रोशनी जा सके.

रेटिना के भीतर जो कोशिकाएं मौजूद होती हैं वो मिल रही रोशनी को आंकलन कर दिमाग़ को संदेश भेजती हैं कि आपकी आंखें क्या देख सकती हैं और क्या नहीं.

उदाहरण के तौर पर, अगर आप ऐसे कमरे में मौजूद हैं जिसमें रोशनी है ही नहीं तो आपकी आंख ख़ुद को उस स्थिति के हिसाब से ढाल लेती है.

जैसे ही आप बल्ब जलाएंगें, तो आपकी आंख पर थोड़ा ज़ोर ज़रूर पड़ेगा, लेकिन कुछ ही पलों में आपकी आंखें मौजूदा रोशनी के साथ ख़ुद को संभाल लेती हैं.

इसी तरह अगर आप कम रोशनी में किताब पढ़ने की कोशिश करते हैं तो आपकी आंखें उस स्थिति में भी ख़ुद को ढाल लेती हैं.

लेकिन कुछ लोगों को फिर भी लगता है कि कम रोशनी में पढ़ने से उनकी आंखों पर ज़ोर पड़ रहा है, जिससे उन्हें सिर में दर्द होने लगता है.

पेचीदा सवाल

Image caption अंधेरे में पढ़ने के बच्चों और वयस्कों पर अलग-अलग परिणाम देखने को मिलते हैं

दुर्भाग्यवश ऐसा कोई शोध नहीं हुआ है जिससे कम रोशनी में पढ़ने से होने वाले दीर्घकालिक असर का पता चल सके.

इसलिए विभिन्न सर्वेक्षणों का अध्ययन कर हमने ये विभिन्न तथ्यों को जोड़ने की कोशिश की.

ज़्यादातर सर्वेक्षणों में चीज़ों को पास से देखने पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया, बजाय कम रोशनी में पढ़ने पर.

कुछ सर्वेक्षणों में कम दिखाई देने के पीछे आनुवांशिक कारण भी बताए गए.

सिडनी में एक सर्वेक्षण में 1700 बच्चों पर शोध किया गया और पाया गया कि जो बच्चे दिन में बाहर खेलने में ज़्यादा समय बिताते हैं, उन्हें आंखों की दिक्कतें कम आती हैं.

लेकिन दिन में ही क्यों?

वो इसलिए क्योंकि एक सिद्धांत के मुताबिक़ बच्चे जो भी खेल खेलते हैं उसमें वे किसी न किसी चीज़ पर फ़ोकस करने की कोशिश करते हैं और दिन की रोशनी में ऐसा करने से आंखों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता.

इस सिद्धांत को माना जाए, तो इसका मतलब ये हुआ कि ज़्यादा रोशनी में पढ़ना ही आपकी आंखों के लिए बेहतर होता है.

लेकिन चूंकि ये सर्वेक्षण बच्चों पर ही किए गए थे तो ये बात ध्यान में रखना ज़रूरी है कि बच्चों की आंखें भी विकसित होती रहती हैं.

जहां तक वयस्कों की बात है, तो शायद उनकी आंखें विकसित हो चुकी होती हैं, इसलिए उन पर कम रोशनी में पढ़ने से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

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