जॉन गर्डन और शिन्या यमनाका को नोबेल

  • 9 अक्तूबर 2012
जॉन गर्डन और शिन्या यमनाका
Image caption ब्रिटेन के जॉन यमनाका (बाएं) और जापान के शिन्या यमनाका (दाएं) को चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल

ब्रिटेन के जॉन गर्डन और जापान के शिन्या यमनाका को संयुक्त रूप से चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया है. गर्डन और यमनाका को स्टेम सेल्स पर काम करने के लिए दुनिया के इस सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

उन्हें ये पुरस्कार व्यस्क शरीर के सेलों को फिरसे भ्रूण स्थिति में प्रोग्राम करने के लिए दिया गया है.

नोबेल समिति ने अपनी घोषणा में कहा है कि दोनों ने अपने क्षेत्र में क्रांतिकारी काम किए हैं.

जब एक स्पर्म अंडे को फ़र्टीलाइज़ करता है तो एक क़िस्म का सेल बनता है. ये कई बार मल्टीप्लाई होने के बाद एक ऐसे सेल का विकास करता है जो बहुत ही महत्वपूर्ण होता है. ये ऐसे टिश्यू को जन्म देता है जो एक साथ शरीर के नर्व, हड्डी और चमड़ी बनाने में कारगर होता है.

क्रांतिकारी प्रयोग

लेकिन इसकी ख़ास बात यह है कि एक बार सेल कोई विशेष रूप ले लेता हौ तो फिर इसे बदलना मुश्किल है.

जॉन ने 1962 में मेंढक के आंत के सेल से तमाम जेनेटिक जानकारी हासिल की और फिर इसे एक नए मेंढक के अंडे से मिलाया. जिसके बाद एक नए टैडपोल का जन्म हुआ.

और ये किसी भी दूसरे सामान्य टैडपोल की तरह ही था.

इसी तकनीक से डॉली नाम के भेड़ का क्लोन तैयार हुआ था, जो पहला स्तनधारी क्लोन है.

40 साल बाद शिन्या यमनाका ने इससे आगे का रास्ता तय किया. हालांकि उनका रास्ता ज़रूर अलग था.

उन्होंने चार जीन को एक साथ त्वचा कोशिकाओं से जोड़ते हुए इसे स्टेम सेल्स में बदल दिया जो एक विशेष क़िस्म की कोशिका में परिवर्तित हो गया. यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है.

मानव जाति

नोबेल पुरस्कार समिति का कहना है कि इस प्रयोग ने हमें ये समझने में मदद की है कि कोशिकाएं और जीवधारी कैसे विकसित हो सकते हैं.

समिति का कहना था, ''इस तकनीक ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को एक ऐसे तकनीक से परिचय कराया है जो चिकित्सा के कई क्षेत्रों में काफ़ी महत्वपूर्ण साबित होगा.''

वहीं इस सम्मान को पाने वाले यमनाका का कहना है कि उनके लिए नोबेल पुरस्कार पाना अत्यधिक गर्व की बात है जो बिना गॉर्डन के संभव ही नहीं था.

इस तकनीक से इंसानों को दिली राहत मिल सकती है. चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इसे एक क्रांतिकारी क़दम माना जा रहा है.

क्योंकि इससे दिल की बीमारी को भी क़ाबू में करने में मदद मिलेगी.

इस तकनीक का विकास हुआ तो बहुत संभव है कि आगे चल कर हमें कोशिकाओं को बदलने की तकनीक का भी ज्ञान हो जाए.

मसलन त्वचा और ब्लड कोशिकाओं से दिमाग़ और दिल की कोशिकाएं तैयार की जा सकती हैं.

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