वनमानुष को लगा इंसानों का रोग

  • 20 नवंबर 2012
वनमानुष

आपको जानकार हैरानी हो सकती है लेकिन एक शोध से पता चला है कि इंसानों की तरह वनमानुषों के जीवनकाल में भी ऐसा दौर आता है जब वो 'मिड-लाइफ क्राइसिस' का ‏शिकार हो जाते हैं.

'ऑक्सफोर्ड एडवान्स्ड लर्नर्स डिक्शनरी' के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति अपने जीवन की अधेड़ावस्था में चिंताग्रस्त हो जाता है, खुद को बेहद निराश महसूस करता है, उसमें आत्मविश्वास की बहुत कमी हो जाती है तो इसे 'मिड-लाइफ क्राइसिस' कहते हैं.

कुछ अन्य स्रोत बताते हैं कि 'मिड-लाइफ क्राइसिस' पश्चिमी समाज से उपजा शब्द है जिसके व्यापक मायनों में यौन जीवन, अकेलापन, भावनात्मक असुरक्षा जैसे तमाम मनोवैज्ञानिक कारक समाहित हैं.

वनमानुष और इंसान

वैसे तो वनमानुष और इंसानों के बर्ताव में कई स्तरों पर समानता देखी गई है लेकिन 'मिड-लाइफ क्राइसिस' के मामले में भी दोनों की बीच समानता शोधकर्ताओं के लिए भी हैरानी का विषय है.

'प्रोसिडिग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़' में प्रकाशित इस शोध के नतीजे बताते हैं कि वनमानुष भी इंसानों की भांति सुख-दुख और अवसाद को महसूस करते हैं.

वनमानुषों के व्यवहार को समझने वाले प्राणि-विज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और अर्थशास्त्रियों को मिलाकर बनाए गए एक दल ने अपने शोध की बुनियाद पर ये निष्कर्ष निकाला है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि इंसानों की तरह वनमानुष भी जवानी के दिनों में रोमांच से भरपूर होते हैं और अधेड़ उम्र आते-आते उनमें 'मिड-लाइफ क्राइसिस' के लक्षण दिखाई देने लगते हैं.

उनका कहना है कि ये चक्र अंग्रेज़ी के शब्द 'यू' के आकार की तरह होता है जो शुरुआत में उत्साह, मध्य अवस्था में गिरावट और फिर आखिर में उत्थान की ओर संकेत करता है.

सरल शब्दों में इसे यूं भी कहा जा सकता है कि ये एक ऐसा चक्र है जिसमें पहले खुशी, फिर गम और आखिर में एक बार फिर खुशी का अहसास चरम पर पहुंच जाता है.

शोध-विधि

Image caption वनमानुष और इंसानों के बर्ताव में कई स्तरों पर समानता देखी गई है.

एडिनबरा यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध और इस शोध में अहम भूमिका निभाने वाले डॉक्टर एलेक्जेंडर वीस के दल ने नर और मादा दोनों तरह के वनमानुषों के व्यवहार का अध्ययन किया.

इसके लिए उन्होंने अलग-अलग अभयारण्यों और चिड़ियाघरों में रहने वाले 508 वनमानुषों का चयन किया जिनकी उम्र भी अलग-अलग थी.

शोध में उन लोगों के अनुभवों को भी शामिल किया गया जो अभयारण्यों या चिड़ियाघरों में इन वनमानुषों की कम से कम दो वर्ष से देखभाल कर रहे थे.

डॉक्टर वीस कहते हैं, ''जिस जिस बात की पड़ताल कर रहे थे, वो ये है कि ये जो 'यू' आकार वाला जीवनचक्र है, क्या उम्र का खुशी और बेहतरी का वनमानुषों के साथ भी वैसा ही संबंध है जैसा इंसानों के मामले में होता है.''

वे ये भी कहते हैं कि इंसानों और वनमानुषों के बीच समानता आनुवांशिकता और मनोविज्ञान से परे भी जा सकती है.

वे इसका उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वनमानुष, इंसानों की तरह सामाजिक दबाव और तनाव महसूस करते हैं.

डॉक्टर वीस कहते हैं, ''वनमानुषों में इंसानों की तरह ऐसा तो नहीं होता कि वे एक चमचमाती लाल रंग की स्पोर्ट्स कार की अचानक मांग कर बैठें. लेकिन इंसानों की ही तरह उनमें ऐसा होता है कि अधिक से अधिक मादाओं के साथ संभोग करना चाहते हैं या ज्यादा से ज्यादा संसाधन जुटाना चाहते हैं.''

'माइंड ब्लोइंग'

वारविक यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर एंड्र्यू ओसवाल्ड भी इस शोध में शामिल थे. वे इंसानी खुशी के बारे में 20 वर्षों से शोध कार्य में जुटे हैं.

वे इस शोध के नतीजों को 'माइंड ब्लोइंग' बताते हैं और इंसानों के मामले में शिक्षा, आमदनी, विवाह जैसी बातों के परिप्रेक्ष्य में कहते हैं कि 'मिड-लाइफ क्राइसिस' एक सत्य है और इसका अस्तित्व होता है.

मनोवैज्ञानिक डॉक्टर वीस कहते हैं कि इस शोध से सोच-विचार के कई दरवाजे खोल दिए हैं क्योंकि लम्बे समय तक ये माना जाता रहा है कि 'मिड-लाइफ क्राइसिस' का संबंध मानव समाज और इंसान की जिंदगी से ही है.

वे ये भी कहते हैं कि ये अपने आप में पूरी तस्वीर नहीं है और इस तस्वीर के दूसरे कई पहलू भी होंगे जिनकी गहराई के पड़ताल करने की जरूरत है.

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