क्या बनाता है इंसान को बुद्धिमान?

बड़ी खुशी होती होगी आपको जब कोई कहता है कि आप बड़े बुद्धिमान हैं, आखिर अपनी तारीफ सुनना किसे पसंद नहीं होता.

पर क्या आपने कभी सोचा है कि ये जो बुद्धि है, वो आखिर आती कहां से है. क्या दिमाग के भीतर बुद्धि पहले से ही भरी होती है?

इन दिनों हमें किसी भी तरह की जानकारी की जरूरत होती है तो हम फौरन गूगल या विकीपीडिया जैसी वेबसाइटों का सहारा लेते हैं.

तो क्या इसका मतलब ये निकाला जाए कि सूचना के ये साधन हमारी बुद्धि को और समृद्ध और सम्पन्न बनाते हैं?

ये सारे सवाल इसलिए क्योंकि कुछ अध्ययनों से संकेत मिलता है कि हमारा अपना मस्तिष्क ही खुद को जितना प्रभावित करता है, अन्य लोग और गूगल जैसे इंटरनेट की दुनिया के औज़ार इस पर उतना ही असर डालते हैं.

सुस्ती पसंद दिमाग

Image caption जानकार मानते हैं कि इंसान बहुत जरूरत पड़ने पर ही मानसिक श्रम करता है.

हमें ये सोचना अच्छा लगता है कि हम पैदाइशी होशियार हैं पर गूगल, वीकिपीडिया और अन्य ऑनलाइन टूल्स ने कई लोगों को ये सवाल पूछने पर विवश कर दिया कि ये तकनीकें हमारे दिमाग पर आखिर क्या असर डालती हैं.

इन सवालों की पड़ताल के लिए कई मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी हुए हैं और ऐसे ही कुछ शोधों से संकेत मिलता है कि हमारी ज्यादातर बुद्धिमत्ता इस बात से तय होती है कि हम अपने आसपास मौजूद दूसरे लोगों और माहौल के साथ किस तरह तालमेल बिठाते हैं.

मनोवैज्ञानिकों में ये सिद्धांत बड़ा लोकप्रिय है कि हम बहुत जरूरी होने पर ही मानसिक श्रम करते हैं वरना दिमाग को कष्ट नहीं देते.

शोध बताते हैं कि लोग आमतौर पर जिन चीजों को याद रख सकते हैं, उन्हें याद रखने के लिए भी वे अपनी याददाश्त का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते हैं और किसी न किसी तरह दूसरों पर निर्भर करते हैं.

दार्शनिक इसकी व्याख्या इस तरह करते हैं कि मस्तिष्क की संरचना ही इस प्रकार की है कि वो माहौल के हिसाब से अपना विस्तार करता है.

दर्शन शास्त्र के एक ज्ञाता एंडी क्लार्क कहते हैं कि इंसानी मस्तिष्क में कुछ ऐसी चीजें होती हैं जो नए विचारों और गूगल जैसे इंटरनेट की दुनिया के औज़ारों के साथ समन्वय स्थापित करती हैं.

वैसे तो दिमाग और बुद्धि को लेकर ये एक ऐसी चर्चा है जिसका ओर-छोर तलाशना आसान नहीं है, लेकिन शायद अब आप सोचें कि क्या मैं वाकई पैदाइशी बुद्धिमान हूं?

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