डायट ड्रिंक पीने वालों को हो सकता है डिप्रेशन

पेय पदार्थ
Image caption 'स्वीटनर' को लेकर लोगों के मन में बहुत सारी आशंकाएं हैं.

विशेषज्ञ ये सवाल उठा रहे हैं कि क्या डायट ड्रिंक से डिप्रेशन का ख़तरा बढ़ जाता है. इस तरह का एक शोध हाल में अमरीका में किया गया है. हालांकि शोध में ये साफ नहीं हो पाया है कि दोनों किस तरह जुड़े हुए हैं.

अमरीका में तक़रीबन ढाई लाख लोगों पर किए गए रिसर्च में पाया गया है कि कृत्रिम रूप से मीठे किए गए पेय पदार्थों का सेवन कर वालों में अवसाद के मामले अधिक पाए जाते हैं. इस शोध को हाल में ही हानेवाले अमरीकन अकादमी ऑफ़ न्यूरोलॉजी की सालाना बैठक में पेश किया जाएगा.

हालांकि शोध में ये साफ नहीं किया गया है कि डायट ड्रिंक और डिप्रेशन में किस तरह का संबंध है.

कहा गया है कि जो कॉफ़ी पीते हैं उनमें अवसाद से ग्रस्त लोगों के मामले पाए जाने का ख़तरा कम है.

शोध में पाया गया कि उन लोगों में डिप्रेशन के शिकार व्यक्तियों की तादाद 10 फीसद कम थी जो प्रतिदिन चार कप कॉफ़ी का सेवन कर रहे थे.

पेय में कमी करें

ये रिसर्च 10 साल की अवधि तक चला.

लेकिन इसकी तुलना में जो लोग गैस से मिले हुए पेय (फ़िज़ ड्रिंक) या कृत्रिम तौर पर मीठे किए गए जूस के चार ग्लास पीते हैं उनमें से एक तिहाई लोगों को डिप्रेशन की शिकायत थी.

नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ हेल्थ, कैरोलिना, के प्रमुख शोधकर्ता होंगले शेन ने कहा कि हमने पाया कि अगर आप कृत्रिम रूप से मीठे किए गए पेय के सेवन में कमी कर देते हैं और उनकी जगह बिना मीठी की गई काफी पीते हैं तो डिप्रेशन का खतरा कम हो जाता है.

हालांकि उन्होंने कहा कि इस मामले में और अधिक शोध की ज़रूरत है.

उनका कहना था कि अमरीका में किया गया ये शोध दूसरे मुल्कों के मामले में लागू नहीं हो सकता है.

आहार संबंधी मामलों से जुड़े हुई ब्रितानी संस्था के गेनर बुसेल का कहना है कि मीठा करने के लिए इस्तेमाल होने वाले पदार्थ में आर्टिफशियल यानी कृत्रिम शब्द जुड़ जाने से लोगों के मन में हमेशा के लिए शंका पैदा कर दिया है.

उनका कहना है कि हालांकि बाज़ार में इस तरह के जो माल भी मौजूद हैं उनका ट्रैक रिकार्ड अच्छा है लेकिन फिर भी पुराने शक की वजह से नए शोध होते रहते हैं.

वो कहती हैं कि नई रिसर्च भी उनमें से एक हैं लेकिन इससे ये नहीं समझा जाना चाहिए कि कृत्रिम तरह से मीठा करने वाले पेय और अवसाद का कोई संबंध है.

संबंधित समाचार