4-डी प्रिंटिंग, विज्ञान का नया चमत्कार

4-डी प्रिंटिंग तकनीक
Image caption 4-डी प्रिंटिंग तकनीक से भविष्य में जीवन बहुत आसान हो सकता है.

दुनिया भर में अभी बहुत सारे लोग 3-डी प्रिंटिंग के बारे में सोच रहे हैं, लेकिन अमरीका के एमआईटी (मैसेचुसेट्स इंस्टिच्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी) के वैज्ञानिक़ों ने दावा किया है कि वो इससे भी विकसित तकनीक 4-डी प्रिंटिंग पर काम कर रहे हैं.

लॉस एंजेल्स में चल रहे टेड कॉंफ़्रेंस में कंप्यूटर वैज्ञानिक स्काइलर टिब्बिट्स ने इस बारे में जानकारी देते हुए दिखाया कि 4-डी तकनीक के ज़रिए वस्तुएं ख़ुद ही जुट जाती हैं.

स्काइलर टिब्बिट्स के अनुसार 4-डी तकनीक का इस्तेमाल उन जगहों में किसी चीज़ को स्थापित करने में किया जा सकता है जहां आसानी से पहुंचना मुश्किल है जैसे कि पानी के अंदर से होकर जाने वाले पाइप.

इसके अलावा इस तकनीक के ज़रिए ऐसे फ़र्नीचर बनाए जा सकते हैं जो कि ख़ुद ही जुट जाएंगे.

एमआईटी के 'सेल्फ़ एसेंबली लैब' से जुड़े स्काइलर टिब्बिट्स ने 4-डी तकनीक के बारे में और अधिक जानकारी देते हुए कहा, ''हमलोगों का मानना है कि चौथा आयाम समय है और समय के साथ स्थिर चीज़ें अपना रूप बदल लेंगी.''

इस तकनीक में एक ख़ास क़िस्म के 3-डी प्रिंटर का इस्तेमाल किया जाता है जोकि कई परतों वाला पदार्थ बना सकता है.

इसे रोज़ाना इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक और पानी को अपने आप में सोख लेने वाले एक दूसरे पदार्थ से मिलाकर बनाया जाता है. इसमें मौजूद पानी इसके लिए ऊर्जा के स्रोत के तौर पर काम करता है.

प्रकृति से प्रेरणा

टिब्बिट्स ने कहा कि प्रिंटिंग अपने आप में कुछ नया नहीं है, असल चीज़ है कि उसके बाद क्या होता है.

टिब्बिट्स फ़िलहाल इस नई खोज को और आगे बढ़ाने के लिए किसी पार्टनर की तलाश कर रहे हैं.

उनके अनुसार भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल फ़र्नीचर, मोटरसाइकिल, कार और इमारतों को बनाने में किया जा सकता है.

उनका कहना था, आप कल्पना करें ज़मीन के अंदर जा रहा पानी का ऐसा पाइप जो ज़रूरत के हिसाब से घट-बढ़ सके औऱ आपको सड़कों को खोदने की ज़रूरत ही न पड़े.''

सॉफ़्टवेयर बनाने वाली कंपनी ऑटोडेस्क के प्रमुख वैज्ञानिक कार्लो ऑलग्युन के अनुसार 4-डी तकनीक की प्रेरणा प्रकृति से मिलती है.

ऑलग्युन का कहना था, ''4-डी प्रिंटिंग तकनीक के ज़रिए दर असल हम जीव विज्ञान की शक्ति का इस्तेमाल करना चाहते हैं और उसमें और सुधार करना चाहते हैं लेकिन अभी इस तकनीक पर पूरी तरह से पकड़ नहीं बनी है.''

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